• Banaras Now, Varanasi
  • March 5, 2026

01 मार्च की तारीख विश्व इतिहास में एक अहम स्थान रखती है। इसी दिन वर्ष 1954 में अमेरिका ने प्रशांत महासागर स्थित बिकिनी अटोल पर अपना सबसे बड़ा परमाणु परीक्षण ‘कैसल ब्रावो’ किया था। यह परीक्षण दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई परमाणु हथियारों की होड़ का बड़ा प्रतीक बना।

द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि दुनिया ऐसे विनाशकारी हथियारों से दूरी बनाएगी, लेकिन इसके विपरीत परमाणु शक्ति की प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई। इसी क्रम में अमेरिका ने मार्शल द्वीप समूह के बिकिनी अटोल को परमाणु परीक्षणों का केंद्र बनाया।

अंगूठी के आकार वाले इस कोरल अटोल में 23 छोटे-छोटे द्वीप शामिल हैं। हवाई और फिलीपींस के बीच स्थित यह स्थान ‘कैसल ब्रावो’ परीक्षण के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया। वर्ष 1954 में 01 मार्च को किए गए इस परीक्षण में करीब 150 लाख टन टीएनटी के बराबर विस्फोट हुआ, जो हिरोशिमा पर गिराए गए बम से लगभग हजार गुना अधिक शक्तिशाली बताया जाता है। विस्फोट से समुद्र में करीब दो किलोमीटर चौड़ा गड्ढा बन गया।

धमाके का असर लगभग 160 किलोमीटर दूर तक महसूस किया गया। कुछ ही घंटों में रेडियोधर्मी कण आसपास के द्वीपों पर गिरने लगे, जिससे वहां रहने वाले लोगों, उनके पीने के पानी और भोजन पर प्रभाव पड़ा। प्रभावित द्वीपों के निवासियों को बाद में वहां से हटाया गया।

वर्ष 1964 में अमेरिकी सरकार ने स्वीकार किया कि परमाणु परीक्षण के कारण स्थानीय लोग रेडिएशन के संपर्क में आए थे। इसके बाद प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया गया।

परमाणु परीक्षणों के ऐतिहासिक और वैश्विक प्रभाव को देखते हुए वर्ष 2010 में यूनेस्को ने बिकिनी अटोल को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। संस्था ने इसे शीत युद्ध की शुरुआत और परमाणु हथियारों की दौड़ का ठोस प्रमाण बताया।

01 मार्च की यह घटना आज भी दुनिया को परमाणु हथियारों के दुष्परिणामों की याद दिलाती है।

Author

thefrontfaceindia@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *