वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिवस के अवसर पर उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विशेष धार्मिक व आध्यात्मिक आयोजनों की धूम रही। इस पावन अवसर पर शहर दक्षिणी के विधायक …
वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिवस के अवसर पर उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विशेष धार्मिक व आध्यात्मिक आयोजनों की धूम रही। इस पावन अवसर पर शहर दक्षिणी के विधायक एवं पूर्व धर्मार्थ कार्य मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी के नेतृत्व में 76 बटुकों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मां गंगा का विधि-विधान से दुग्धाभिषेक और पूजन-अर्चन किया। इस दौरान उपस्थित जनसमूह ने अपने प्रिय सांसद व प्रधानमंत्री के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगलमय जीवन की प्रार्थना की।
घाट पर आयोजित इस अनुष्ठान के दौरान माहौल पूरी तरह भक्तिमय नजर आया। बटुकों द्वारा उच्चारित वेदमंत्रों और मां गंगा के जयकारों से पूरा तट गूंज उठा। आयोजन में शामिल स्थानीय नागरिक व श्रद्धालु अपने हाथों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चित्र लेकर खड़े रहे और उनके प्रति अपनी आस्था व सम्मान प्रकट किया।
पूर्व मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने इस अवसर पर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिवस सेवा, आध्यात्मिक आस्था और जनकल्याण की भावना के साथ मनाया जा रहा है। काशी की समृद्ध धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में मां गंगा का स्थान सर्वोच्च है, इसलिए 76 बटुकों के साथ गंगा पूजन कर प्रधानमंत्री के स्वस्थ व दीर्घायु जीवन की कामना करना काशीवासियों की अटूट आस्था और परंपरा का स्वाभाविक प्रकटीकरण है। इस विशेष धार्मिक अनुष्ठान में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में पावन श्रावण मास के भव्य स्वागत की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस वर्ष सावन का पवित्र महीना 30 जुलाई से शुरू होकर 28 …
वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में पावन श्रावण मास के भव्य स्वागत की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस वर्ष सावन का पवित्र महीना 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक रहेगा। इस दौरान बाबा श्री काशी विश्वनाथ मंदिर समेत शहर के तमाम प्रमुख शिवालयों में दर्शन, पूजन और जलाभिषेक के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के जुटने की उम्मीद है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार श्रावण मास में चार सोमवार के साथ-साथ पांच बृहस्पतिवार और पांच शुक्रवार का विशेष संयोग बन रहा है।
भक्ति का माहौल और विशेष धार्मिक अनुष्ठान
सावन के दौरान दूर-दराज से आने वाले कांवड़ियों के जत्थे माँ गंगा का पवित्र जल लेकर बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करेंगे। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, सावन के महीने में किए गए अनुष्ठान विशेष रूप से फलदायी होते हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व:
विशेष पूजा: रुद्राभिषेक, सामूहिक पार्थिव शिवलिंग पूजन और बेलपत्र अर्पण।
व्रत एवं मंत्र: सावन सोमवार व्रत, महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप और शिवमहापुराण कथा का श्रवण अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
काशी में पारंपरिक यात्राओं की धूम
सावन भर केवल शिव उपासना ही नहीं, बल्कि काशी की पौराणिक यात्राओं की परंपरा भी निभाई जाएगी।
पंचक्रोशी एवं लिंगिया यात्रा: शीतला माता मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय ‘लिंगिया’ के अनुसार, सावन में शिव और दुर्गा यात्राओं का विशेष पौराणिक महत्व है।
विभिन्न प्रदक्षिणा यात्राएं: काशी प्रदक्षिणा दर्शन यात्रा समिति (1972 से कार्यरत) इस वर्ष भी कई यात्राओं का आयोजन करने जा रही है:
तिथि
यात्रा का नाम
प्रमुख विवरण
2 अगस्त
केदारेश्वर अंतर्गृही प्रदक्षिणा
गौरी केदारेश्वर मंदिर से शुरुआत, काशी के 145 शिवालयों में दर्शन व जलाभिषेक
9 अगस्त
द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा
काशी में स्थित ज्योतिर्लिंग स्वरूपों के दर्शन
16 अगस्त
त्रिशूल यात्रा
पौराणिक मार्गों से होकर शिव धामों की परिक्रमा
23 अगस्त
एकादश महारुद्र लिंग प्रदक्षिणा
महारुद्र स्वरूपों का दर्शन-पूजन
24 अगस्त
बैजनाथ धाम यात्रा
श्रद्धालुओं का विशेष दल पूजन हेतु प्रस्थान करेगा
प्रशासन और मंदिर प्रबंधन श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए व्यापक इंतजाम करने में जुटा है, ताकि काशी आने वाले हर शिव भक्त को सुलभ दर्शन हो सकें।
वाराणसी। धर्म, अध्यात्म और सनातन संस्कृति की वैश्विक राजधानी काशी में गुरुवार को एक अलौकिक और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला। न्याय एवं धर्म के अधिष्ठाता और काशी के कोतवाल भगवान …
वाराणसी। धर्म, अध्यात्म और सनातन संस्कृति की वैश्विक राजधानी काशी में गुरुवार को एक अलौकिक और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला। न्याय एवं धर्म के अधिष्ठाता और काशी के कोतवाल भगवान श्री काल भैरव स्वयं अपने भक्तों को दर्शन व आशीष देने के लिए नगर भ्रमण पर निकले। मौका था स्वर्णकार क्षत्रिय कमेटी, वाराणसी द्वारा आयोजित 72वीं भव्य शोभायात्रा का। जैसे ही स्वर्णिम रथ पर विराजमान बाबा श्री काल भैरव की स्वर्ण-रजत पंचबदन प्रतिमा ने अपनी यात्रा शुरू की, वैसे ही पूरी काशी “हर-हर महादेव” और “जय बाबा काल भैरव” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठी। भीषण गर्मी और तपिश के बावजूद भक्तों की आस्था भारी पड़ी और रास्ते भर श्रद्धालु अपने आराध्य को शीतलता प्रदान करने के लिए पारंपरिक ताड़ का पंखा डोलाते नजर आए।
सन् 1954 से अनवरत चली आ रही इस गौरवशाली परंपरा के तहत निकली इस शोभायात्रा में पूर्वांचल सहित देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। चौखंभा स्थित काठ की हवेली से वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और डमरुओं की दिव्य गूंज के साथ इसका भव्य शुभारंभ हुआ। स्वर्णकार क्षत्रिय कमेटी के अध्यक्ष घनश्याम सेठ ‘बच्चा’, महामंत्री राजू वर्मा, कोषाध्यक्ष विक्रम सिंह और शोभायात्रा मंत्री जनार्दन वर्मा सहित अन्य पदाधिकारियों ने भगवान की विधिवत आरती उतारकर रथ को आगे बढ़ाया। इस धार्मिक उत्सव में पारंपरिक केसरिया पगड़ी पहने कमेटी के पदाधिकारी सनातन संस्कृति की गरिमा का संदेश दे रहे थे।
शोभायात्रा का आकर्षण और इसकी सांस्कृतिक छटा देखते ही बन रही थी। सबसे आगे धर्मध्वजा थामे श्रद्धालु चल रहे थे, जिनके पीछे ताशा-बाजा, पाइप बैंड, और 11 छत्रधारी घोड़ों पर सवार देवस्वरूप चल रहे थे। यात्रा में शामिल माता वैष्णो देवी और गोविंदेश्वर महादेव की जीवंत झांकियों ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके साथ ही भगवान राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, मां काली और हनुमान जी के सजीव रूपों को देखने के लिए सड़कों के दोनों ओर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी रही। शहनाई की मधुर धुन और न्यू इवेंट प्लानर की टीम द्वारा गाए गए भजनों ने पूरे माहौल को पूरी तरह शिवमय और भक्तिरस से सराबोर कर दिया। यह दिव्य शोभायात्रा अपने पारंपरिक रास्तों—चौखंभा, बीबीहटिया, जतनबर, विशेश्वरगंज, महामृत्युंजय, दारानगर, मैदागिन, बुलानाला, चौक, नारियल बाजार, गोविंदपुरा, ठठेरी बाजार, सोराकुआं और गोलघर से होते हुए वापस श्री काल भैरव मंदिर पहुंची।
पूरे मार्ग में जगह-जगह सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा पुष्पवर्षा की गई, बाबा की आरती उतारी गई और भीषण गर्मी को देखते हुए श्रद्धालुओं के लिए शीतल पेय व प्रसाद का वितरण किया गया। मंदिर परिसर में विद्वान ब्राह्मणों द्वारा बाबा की भव्य महाआरती की गई, जिसके बाद प्रतिमा को पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया गया। शाम को आचार्य पंडित जय कृष्ण दीक्षित के नेतृत्व में 11 ब्राह्मणों द्वारा विशेष बसंत पूजन और वैदिक अनुष्ठान संपन्न हुआ।
इस भव्य आयोजन में उत्तर प्रदेश सरकार के आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. दयाशंकर मिश्र “दयालु”, विधायक व पूर्व मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी सहित कई पार्षदों, संतों, पीठाधीश्वरों और विशिष्ट जनों ने हाजिरी लगाई, जिन्हें कमेटी द्वारा अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।
वाराणसी। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन अत्यधिक जलाभिषेक के कारण बीमार हुए भगवान जगन्नाथ 14 दिनों तक विश्राम और काढ़ा पीने के बाद अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं। आषाढ़ …
वाराणसी। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन अत्यधिक जलाभिषेक के कारण बीमार हुए भगवान जगन्नाथ 14 दिनों तक विश्राम और काढ़ा पीने के बाद अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं। आषाढ़ मास की अमावस्या के दिन, यानी 15वें दिन तड़के 5 बजे, कपाट खुलने के साथ ही भगवान ने अपने भक्तों को दर्शन दिए।
मंदिर के मुख्य पुजारी राधेश्याम पांडेय ने प्रभु का मनमोहक शृंगार सफेद फूलों और श्वेत वस्त्रों से किया। इसके पश्चात पंचामृत का भोग लगाकर भव्य आरती संपन्न की गई, जिसे बाद में भक्तों के बीच प्रसाद रूप में बांटा गया। प्रभु को स्वास्थ्य लाभ के लिए आज विशेष रूप से परवल के जूस का भी भोग लगाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार, कल भगवान की डोली निकाली जाएगी और 16 से 18 जुलाई तक चलने वाले ऐतिहासिक रथयात्रा मेले में भगवान रथ पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
क्या है काशी के इस जगन्नाथ मंदिर का इतिहास?
इस मंदिर की स्थापना की कहानी 1765 के आसपास शुरू होती है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के तत्कालीन मुख्य पुजारी ब्रह्मचारी जी का वहां के राजा से किसी बात पर विवाद हो गया था। इसके बाद वे पुरी छोड़कर काशी चले आए और अपने साथ भगवान वासुदेव, भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा जी की प्रतिमाओं का प्रतिरूप ले आए। काशी में वे गंगा किनारे अस्सी घाट पर निवास करने लगे।
कुछ समय बाद पुरी के राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने हर हफ्ते बनारस में ‘बहंगी’ (भगवान का प्रसाद) भेजना शुरू कर दिया। ब्रह्मचारी जी का नियम था कि वे केवल पुरी के भगवान जगन्नाथ को चढ़ा हुआ प्रसाद ही ग्रहण करते थे। एक बार उड़ीसा में भयंकर चक्रवात और बाढ़ आ गई, जिसके कारण कई हफ्तों तक बहंगी काशी नहीं पहुंच सकी और पुजारी जी को भूखा रहना पड़ा। इसी दौरान उन्हें स्वप्न में भगवान ने काशी में ही मंदिर बनाने और यहीं भोग लगाने का आदेश दिया।
भोंसले राजवंश ने कराया था निर्माण
मंदिर परिसर में लगे घंटे पर दर्ज जानकारी के मुताबिक, इसका निर्माण कार्य 1768 में शुरू हुआ था। पुजारी जी ने मंदिर निर्माण के लिए छत्तीसगढ़ के भोंसले साम्राज्य से सहायता मांगी थी। राजा व्यंकोजी भोंसले ने इसके लिए प्रचुर धन उपलब्ध कराया। यही नहीं, मंदिर और रथयात्रा के सुचारू संचालन के लिए राजा ने ‘तखतपुर महाल’ दान में दे दिया, जिसके राजस्व से सारा प्रबंधन होता था। मंत्री पंडित बेनीराम और कटक के दीवान विश्वंभर पंडित की देखरेख में 1790 में यह भव्य मंदिर पूरी तरह बनकर तैयार हुआ।
1857 की क्रांति के बाद बंद हुआ राजस्व
शुरुआत में बनारस के इस मंदिर में भी पुरी की तरह ही सारे नियम लागू थे। लेकिन 1857 की क्रांति के दौरान भोंसले साम्राज्य अंग्रेजों के कब्जे में आ गया और उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई। इससे मंदिर को मिलने वाला राजस्व बंद हो गया और लंबे समय तक इसकी उपेक्षा हुई।
बाद में मंत्री बेनीराम को मंदिर का प्रबंधक बनाया गया। 1805 में बेनीराम के निधन के बाद से पिछले 221 वर्षों से उनके वंशज ही इस मंदिर की पूजा-पाठ और व्यवस्था संभाल रहे हैं। वहीं, पुजारी ब्रह्मचारी जी ने 1818 में पुरी की परिक्रमा करने के बाद काशी लौटकर अस्सी घाट पर समाधि ले ली थी। मंदिर में आज भी उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं की पूजा की जाती है।
मंदिर की वास्तुकला और अन्य प्रतिमाएं
मुख्य मूर्तियां: गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां पूजा का विधान भी पुरी के मंदिर जैसा ही है।
नृसिंह भगवान: मुख्य मूर्तियों के साथ ही लगभग 4 मीटर ऊंची भगवान नृसिंह और भक्त प्रह्लाद की विशाल प्रतिमा भी मौजूद है। बाहर की तरफ गरुड़ देव स्थापित हैं।
वैष्णव देवता: मंदिर आयताकार है और इसके चारों कोनों पर वैष्णव स्वरूपों (श्री कृष्ण, राम पंचायतन, कालिया मर्दन और लक्ष्मीनारायण) की मूर्तियां विराजमान हैं।
कॉरिडोर नुमा परिसर: इस मंदिर का मुख्य शिखर करीब 16 मीटर ऊंचा है। पूरा परिसर एक कॉरिडोर की तरह दिखता है जिसे तीन द्वार जोड़ते हैं। पहला गेट मंदिर के पट से लगभग 300 मीटर की दूरी पर है, जहां से भगवान का पट बिल्कुल सीधे दिखाई देता है।
वाराणसी। काशी के कोतवाल बाबा श्री काल भैरव जी की वर्ष 1954 में निर्मित ऐतिहासिक स्वर्ण-रजत प्रतिमा की भव्य शोभायात्रा आगामी 16 जुलाई 2026, दिन गुरुवार को निकाली जाएगी। प्रातः 7:00 …
वाराणसी। काशी के कोतवाल बाबा श्री काल भैरव जी की वर्ष 1954 में निर्मित ऐतिहासिक स्वर्ण-रजत प्रतिमा की भव्य शोभायात्रा आगामी 16 जुलाई 2026, दिन गुरुवार को निकाली जाएगी। प्रातः 7:00 बजे चौखम्भा स्थित काठ की हवेली से इस भव्य यात्रा का शुभारंभ होगा। पराड़कर स्मृति भवन में आयोजित एक पत्रकार वार्ता के दौरान स्वर्णकार क्षत्रिय कमेटी वाराणसी के अध्यक्ष घनश्याम सेठ “बच्चा” ने यह महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने पूरी काशी की धर्मपरायण जनता और विशेष रूप से स्वर्ण व्यवसायियों से अपील की है कि वे शोभायात्रा के समय अपने प्रतिष्ठान स्थगित रखकर सपरिवार इसमें शामिल हों और पुण्य के भागीदार बनें।
घुड़सवार, डमरू दल और माँ वैष्णो देवी की झांकी होगी मुख्य आकर्षण
अध्यक्ष घनश्याम सेठ “बच्चा” ने बताया कि इस वर्ष की शोभायात्रा को बेहद अनूठा और भव्य रूप दिया जा रहा है। यात्रा की सुरक्षा और अगुवाई के लिए सबसे आगे पुलिस के घुड़सवार चलेंगे। इसके पीछे ढोल-ताशा, डमरू दल और स्वर्णकार क्षत्रिय कमेटी का मुख्य बैनर होगा। यात्रा में कमेटी के संस्थापक द्वय स्वर्गीय किशुन सेठ जी एवं स्वर्गीय भीखू सिंह जी के चित्रों को फूलों से सुसज्जित कर शामिल किया जाएगा। इस वर्ष आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु माँ वैष्णो देवी और गोविंदेश्वर महादेव की विशेष झांकियां होंगी। साथ ही, न्यू लाइफ इंवेंट प्लानर के कलाकार नीरज सेठ के नेतृत्व में मधुर भजनों की प्रस्तुति देते हुए चलेंगे। यात्रा में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व हनुमान जी के जीवंत स्वरूप घोड़ों पर सवार दिखेंगे, जबकि शंकर-पार्वती, राधा-कृष्ण और मां काली की मनमोहक झांकियां भक्तों को मंत्रमुग्ध करेंगी।
पत्रकारवार्ता में शामिल स्वर्णकार क्षत्रिय कमेटी के पदाधिकारी
इन रास्तों से गुजरेगी यात्रा, जगह-जगह होगी पुष्प वर्षा
शोभायात्रा के समापन पर विभिन्न प्रकार के सुगंधित फूलों से सजे रथ पर बाबा काल भैरव जी की दिव्य स्वर्ण-रजत प्रतिमा विराजमान रहेगी, जिसके आगे पारंपरिक शहनाई वादन होगा। कमेटी के महामंत्री राजू वर्मा (बिछिया वाले) ने बताया कि यह शोभायात्रा चौखम्भा स्थित काठ की हवेली से शुरू होकर बीबी हटिया, जतनबर, विशेश्वरगंज, महामृत्युंजय, दारानगर, मैदागिन, बुलानाला, चौक, नारियल बाजार, गोविन्द पुरा, ठठेरी बाज़ार, सोराकुऑ, गोलघर और भुतई इमली होते हुए भैरोनाथ चौराहे पर विश्राम लेगी। पूरे मार्ग में विभिन्न सामाजिक संगठनों और भक्तों द्वारा तोरणद्वार बनाकर बाबा का स्वागत, पूजन-आरती और पुष्प वर्षा की जाएगी। साथ ही संपूर्ण रास्ते में भक्तों के लिए प्रसाद वितरण की व्यवस्था रहेगी।
भव्य श्रृंगार के बाद रात्रि शयन आरती तक होंगे दर्शन
भैरोनाथ चौराहे पर यात्रा के विश्राम के बाद बाबा काल भैरव की इस ऐतिहासिक स्वर्ण-रजत प्रतिमा को गर्भगृह में प्रतिस्थापित किया जाएगा। इसके बाद बाबा का अलौकिक व भव्य श्रृंगार होगा, जिसके दर्शन रात्रि शयन आरती तक अनवरत चलते रहेंगे। सायंकाल के समय आचार्य पंडित जयकृष्ण दीक्षित के सान्निध्य में वैदिक रीति-रिवाज से बसंत पूजा संपन्न कराई जाएगी। इस पावन अवसर पर परंपरा के अनुसार ‘काशी के कोतवाल’ पत्रिका का भी प्रकाशन किया गया है, जिसके संपादन की जिम्मेदारी रविशंकर सिंह, सह-संपादक कमल कुमार सिंह एवं संदीप सेठ ने निभाई है।
सुरक्षा और स्वच्छता के पुख्ता इंतजाम
शोभायात्रा व सांस्कृतिक मंत्री जनार्दन वर्मा “प्रधान” के नेतृत्व में यात्रा के कुशल संचालन के लिए सहयोगियों की एक विशेष टीम गठित की गई है। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नागरिक सुरक्षा कोतवाली प्रखंड के पोस्ट वार्डेन धर्मेन्द्र गौतम के नेतृत्व में 10 सदस्यीय टीम वॉकी-टॉकी के साथ पूरी यात्रा में मुस्तैद रहेगी। इसके अलावा, नगर आयुक्त को पत्रक सौंपकर शोभायात्रा मार्ग की सड़कों की मरम्मत और मुकम्मल साफ-सफाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है। मंदिर परिसर, गर्भगृह और मुख्य रास्तों को रंग-बिरंगी झालरों व आकर्षक फूलों से सजाया जा रहा है। यात्रा के मीडिया प्रभारी का प्रभार डॉ. कैलाश सिंह विकास एवं किशोर कुमार सेठ को सौंपा गया है।
पत्रकार वार्ता में मुख्य रूप से अध्यक्ष घनश्याम सेठ “बच्चा”, महामंत्री राजू वर्मा, कोषाध्यक्ष विक्रम सिंह, जनार्दन वर्मा “प्रधान”, संरक्षक कृष्ण कुमार सेठ “बच्चू जी” व श्याम सुन्दर सिंह, रविशंकर सिंह, डॉ. कैलाश सिंह विकास, किशोर कुमार सेठ, कमल कुमार सिंह, अनुज गौतम “बंटी”, सतीश कुमार सिंह और संदीप सेठ उपस्थित रहे।
वाराणसी। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (Shri Kashi Vishwanath Temple) में आगामी श्रावण मास को लेकर व्यापक और चाक-चौबंद तैयारियां शुरू हो गई हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ …
वाराणसी। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (Shri Kashi Vishwanath Temple) में आगामी श्रावण मास को लेकर व्यापक और चाक-चौबंद तैयारियां शुरू हो गई हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े निर्देशों के बाद मंदिर प्रशासन, जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने संयुक्त रूप से कमर कस ली है। मंगलवार को वाराणसी के आला अधिकारियों की मौजूदगी में एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक संपन्न हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य देश-विदेश से आने वाले लाखों कांवड़ियों और शिवभक्तों को सुरक्षित, सुगम और निर्बाध दर्शन की व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
इस वर्ष महादेव का सबसे प्रिय महीना सावन 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त को समाप्त होगा। इस बार सावन के दौरान पूरे एक महीने काशी पूरी तरह शिवभक्तों के रंग में रंगी नजर आएगी। मंदिर न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्व भूषण मिश्र ने बताया कि श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को बाबा विश्वनाथ का उनके अलग-अलग दिव्य और अलौकिक स्वरूपों में विशेष श्रृंगार किया जाएगा। यह अद्भुत नजारा भक्तों को एक अनोखी आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करेगा।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार, सावन के चारों सोमवार को बाबा के विभिन्न रूपों के दर्शन होंगे। 03 अगस्त को पहले सोमवार के दिन बाबा का ‘श्री शंकर स्वरूप’ श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद 10 अगस्त को दूसरे सोमवार को ‘गौरी-शंकर’ (शंकर-पार्वती) रूप, 17 अगस्त को तीसरे सोमवार को ‘अर्धनारीश्वर’ रूप और 24 अगस्त को चौथे व अंतिम सोमवार को बाबा का अलौकिक ‘रुद्राक्ष श्रृंगार’ किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, सावन के समापन के ठीक पहले 27 अगस्त को पूर्णिमा के पावन अवसर पर वार्षिक ‘झूला श्रृंगार’ का भव्य आयोजन होगा।
भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर योगी सरकार बेहद गंभीर है। सावन में उमड़ने वाले जनसैलाब को देखते हुए जिग-जैग रेलिंग, अतिरिक्त बैरिकेडिंग, जगह-जगह चिकित्सा सहायता शिविर, ओआरएस-पेयजल की मुकम्मल व्यवस्था और स्वच्छता पर विशेष फोकस किया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा और सेवा के इस मजबूत गठजोड़ से हर शिवभक्त बिना किसी असुविधा के बाबा धाम में जलाभिषेक कर सकेगा।
वाराणसी। श्री काशी विश्वनाथ (Shri Kashi Vishwanath Dham) धाम में आगामी श्रावण मास की व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद करने के लिए मंगलवार शाम एक अहम समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस बार …
वाराणसी। श्री काशी विश्वनाथ (Shri Kashi Vishwanath Dham) धाम में आगामी श्रावण मास की व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद करने के लिए मंगलवार शाम एक अहम समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस बार सावन का पवित्र महीना 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगा। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए बाबा के दरबार में प्रवेश के लिए 7 गेट निर्धारित किए गए हैं। मंदिर प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि पूरे सावन महीने में किसी भी तरह की ‘वीआईपी प्रोटोकॉल’ व्यवस्था लागू नहीं होगी; चाहे कोई भी हो, सबको कतार में लगकर ही बाबा के दर्शन करने होंगे।
मंडलायुक्त एस. राजलिंगम और पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल की संयुक्त अध्यक्षता में हुई इस बैठक में डीएम सत्येंद्र कुमार समेत तमाम आला अधिकारी मौजूद रहे।
भक्तों की सहूलियत के लिए खास इंतजाम
प्रशासन ने बाबा के भक्तों की सुरक्षा और सुविधा के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
गर्मी से राहत: कतारों में खड़े श्रद्धालुओं के लिए बड़े इंडस्ट्रियल एयर कूलर लगाए जाएंगे। साथ ही पेयजल, मेडिकल कैंप, ओआरएस, ग्लूकोज और चौबीसों घंटे एंबुलेंस की तैनाती रहेगी।
मुफ्त गोल्फ कार्ट: बुजुर्गों, दिव्यांगों और लाचार श्रद्धालुओं के लिए गोदौलिया से मैदागिन के बीच निशुल्क गोल्फ कार्ट सेवा उपलब्ध कराई जाएगी।
सुरक्षा और नियंत्रण: भीड़ को संभालने के लिए जिग-जैग रेलिंग पर एक्स्ट्रा बैरिकेडिंग की जाएगी। पूरे परिसर की सीसीटीवी से निगरानी होगी और 6 जगहों पर ‘खोया-पाया केंद्र’ काम करेंगे।
जरूरी सूचना: मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे खाली पेट दर्शन के लिए न आएं, क्योंकि भीड़ के कारण लाइन में लंबा वक्त लग सकता है।
इन चीजों पर रहेगा पूरी तरह प्रतिबंध, नहीं मिलेंगे बैगेज काउंटर
सुरक्षा कारणों से इस बार धाम के भीतर मोबाइल फोन, स्मार्ट वॉच, ईयरफोन, बड़े बैग, मेटल की चीजें, तंबाकू और सिगरेट जैसी प्रतिबंधित सामग्रियां ले जाने की बिल्कुल इजाजत नहीं होगी। सबसे जरूरी बात यह है कि इस बार मंदिर परिसर में निःशुल्क बैगेज काउंटर (सामान रखने की जगह) संचालित नहीं किए जाएंगे, इसलिए श्रद्धालु अपना सामान पहले ही सुरक्षित जगह रखकर आएं।
चारों सोमवार को होगा बाबा का अलौकिक श्रृंगार
इस साल सावन के चारों सोमवार (3, 10, 17 और 24 अगस्त) को बाबा विश्वनाथ का भव्य और विशेष श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद 27 अगस्त (पूर्णिमा) को झूला श्रृंगार और 28 अगस्त (रक्षाबंधन) को सामान्य दर्शन होंगे। जो भक्त वाराणसी नहीं आ सकते, वे मंदिर न्यास की ऑफिशियल वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के माध्यम से घर बैठे बाबा के ‘लाइव दर्शन’ का लाभ उठा सकेंगे।
वाराणसी। अयोध्या के राम मंदिर में सामने आए कथित दान चोरी के मामले को लेकर धार्मिक नगरी काशी में संतों में गहरा आक्रोश है। इस गंभीर विषय पर मंगलवार शाम संतों …
वाराणसी। अयोध्या के राम मंदिर में सामने आए कथित दान चोरी के मामले को लेकर धार्मिक नगरी काशी में संतों में गहरा आक्रोश है। इस गंभीर विषय पर मंगलवार शाम संतों ने सुमेरू पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती की अध्यक्षता में एक अहम बैठक की। बैठक में संतों ने एक सुर में कहा कि प्रभु श्रीराम के मंदिर में इस तरह की कृत्य ने देश-विदेश के करोड़ों रामभक्तों की आस्था को ठेस पहुंचाई है। संतों ने मांग की कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक ठोस और स्थायी व्यवस्था बनाई जाए और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त किया जाए।
आस्था के केंद्र में ऐसी लापरवाही निंदनीय: शंकराचार्य
बैठक के दौरान सुमेरू पीठाधीश्वर शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अयोध्या अनादि काल से करोड़ों सनातनियों की श्रद्धा और भक्ति का सर्वोच्च केंद्र है। दानपेटी से चोरी का यह मामला बेहद संवेदनशील है।
जांच और कार्रवाई पर नजर: शंकराचार्य ने कहा कि पुलिस प्रशासन द्वारा कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने और सरकार द्वारा निष्पक्ष जांच के भरोसे का वे स्वागत करते हैं, लेकिन दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो नजीर बने। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यह गड़बड़ी कई महीनों से चल रही थी और जिम्मेदार अधिकारी सोते रहे, तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है।
सरकारी तंत्र के बजाय स्वतंत्र बोर्ड के हाथों में हो कमान
मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चल रही देशव्यापी बहस पर शंकराचार्य ने एक बड़ा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि केवल पुलिस बल बढ़ा देने या सुरक्षा कड़ी करने से ऐसी चोरियां नहीं रुकेंगी। इसके लिए तकनीकी निगरानी, पारदर्शिता और नियमित ऑडिट जरूरी है।
स्वतंत्र बोर्ड का गठन: मंदिरों का संचालन सरकारी अधिकारियों के बजाय संत समाज, समर्पित श्रद्धालुओं, प्रबुद्ध वर्ग और प्रतिष्ठित नागरिकों की भागीदारी वाले एक स्वतंत्र बोर्ड (Independent Board) के माध्यम से होना चाहिए। इससे व्यवस्था में जवाबदेही तय होगी और जनविश्वास बहाल होगा।
मंदिर के धन से चलें गुरुकुल और गौशालाएं
शंकराचार्य ने देश के अन्य बेहतर प्रबंधित मंदिरों का उदाहरण देते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों पर आने वाले चढ़ावे का सदुपयोग समाजहित में होना चाहिए। श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धापूर्वक दान किए गए धन का उपयोग निम्नलिखित कार्यों में प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए:
प्राचीन गुरुकुलों की स्थापना और संचालन में।
बेसहारा गायों के लिए आधुनिक गौशालाओं के रख-रखाव में।
निर्धन छात्रों की उच्च शिक्षा और सनातन संस्कृति के संरक्षण में।
तीर्थयात्रियों के लिए बेहतर और आधुनिक सुविधाएं विकसित करने में।
वाराणसी। काशी के अस्सी स्थित ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर में जेठ माह की पूर्णिमा तिथि पर सोमवार को भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के वार्षिक स्नान पर्व का भव्य …
वाराणसी। काशी के अस्सी स्थित ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर में जेठ माह की पूर्णिमा तिथि पर सोमवार को भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के वार्षिक स्नान पर्व का भव्य शुभारंभ हुआ। देश और समाज में सुख, समृद्धि तथा आरोग्यता की कामना को लेकर हजारों भक्तों ने भगवान का जलाभिषेक किया। सुबह से ही पूरा मंदिर परिसर ‘जय जगन्नाथ’ के जयकारों और वैदिक मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा।
स्नान पर्व की शुरुआत सोमवार प्रातः काल 5:15 बजे भव्य आरती और विशेष श्रृंगार के साथ हुई। मुख्य पुजारी राधेश्याम पांडे ने भगवान जगन्नाथ का गणेश स्वरूप में गुलाब, चंपा, चमेली, बेला और गेंदे के सुगंधित फूलों से अलौकिक श्रृंगार किया। महाआरती के संपन्न होने के बाद विग्रहों से भगवान गणेश का मुखौटा हटाया गया, जिसके बाद जलाभिषेक की मुख्य रस्म शुरू हुई। मंदिर ट्रस्ट के न्यासियों और सदस्यों ने सबसे पहले पवित्र नदियों के जल से भरे 108 कलशों से भगवान का महास्नान कराया। इसके बाद मंदिर के कपाट आम भक्तों के दर्शन और जलाभिषेक के लिए खोल दिए गए।
इस पावन अवसर पर अस्सी घाट से एक बेहद भव्य और आकर्षक कलश यात्रा निकाली गई। मातृ शक्तियों (महिलाओं) ने सिर पर पवित्र जल के कलश धारण कर अस्सी घाट से मंदिर परिसर तक की दूरी तय की। इस यात्रा के आगे-आगे चल रहे डमरू दल के सदस्यों द्वारा किए जा रहे डमरू वादन ने पूरे वातावरण को शिव-मयी और भक्तिमय बना दिया। मंदिर पहुँचकर महिलाओं ने कतारबद्ध होकर भगवान का जलाभिषेक किया और परिवार व समाज की खुशहाली की मन्नतें मांगीं।
धार्मिक अनुष्ठानों के बीच मंदिर के जीर्णोद्धार और निर्माण कार्य को भी बड़ा संबल मिला। समारोह के दौरान पूज्य स्वामी सदानंद महाराज ने मंदिर निर्माण के लिए 11 लाख रुपये का चेक मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष व पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह को सौंपा। इस दौरान ट्रस्ट के अध्यक्ष बृजेश सिंह, उनकी पत्नी एमएलसी अन्नपूर्णा सिंह और पुत्र सिद्धार्थ सिंह ने पूरे विधि-विधान से भगवान का पूजन और जलाभिषेक किया। वहीं ट्रस्ट के सचिव शैलेश त्रिपाठी ने वेदपाठी ब्राह्मणों के मंत्रोच्चार के बीच अभिषेक की रस्म पूरी की।
इस भव्य धार्मिक उत्सव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक सुखदेव त्रिपाठी, हरीश वालिया, नवीन जी, शिशिर मालवीय, रामयश मिश्र, जगन्नाथ जी, दिलीप मिश्रा, आशु त्रिपाठी सहित काशी के प्रबुद्ध नागरिक और भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
वाराणसी। संत शिरोमणि कबीर साहेब के तीन दिवसीय प्राकट्य महोत्सव के दूसरे दिन लहरतारा स्थित कबीर प्राकट्य स्थली भक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम की गवाह बनी। इस पावन अवसर पर …
वाराणसी। संत शिरोमणि कबीर साहेब के तीन दिवसीय प्राकट्य महोत्सव के दूसरे दिन लहरतारा स्थित कबीर प्राकट्य स्थली भक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम की गवाह बनी। इस पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के स्टांप एवं पंजीकरण मंत्री रवींद्र जायसवाल ने महोत्सव में शिरकत की और कबीर साहेब के चरणों में मत्था टेककर आशीर्वाद लिया। कबीर प्राकट्य स्थली के विकास पर बात करते हुए मंत्री जायसवाल ने कहा कि इस पवित्र स्थल का पहले के मुकाबले काफी विकास हो चुका है और आने वाले समय में उत्तर प्रदेश सरकार इसे और भव्य रूप देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। महोत्सव के दूसरे दिन का मुख्य आकर्षण “कबीर की विरासत: काशी से मगहर तक—इतिहास, स्मृति और लोक परंपरा” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी रही। संत कबीर प्राकट्य स्थली (लहरतारा), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और संत कबीर अकादमी (मगहर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बौद्धिक परिचर्चा में देश भर से आए विद्वानों, शोधार्थियों, सामाजिक चिंतकों और संत-महात्माओं ने कबीर के विचारों पर गहराई से मंथन किया।
कबीर की वाणी केवल साहित्य नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का माध्यम: प्रो. बिहारी लाल शर्मा संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कबीर साहेब को भारतीय संस्कृति का महान लोकनायक बताया। उन्होंने कहा कि कबीर ने मानवता, समानता और आध्यात्मिक स्वतंत्रता का जो संदेश दिया, उसकी प्रासंगिकता आज के दौर में और अधिक बढ़ गई है। कबीर की वाणी केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह समाज को बदलने और आत्मबोध कराने का एक सशक्त माध्यम है। वहीं मुख्य अतिथि प्रोफेसर एस. एन. संखवार ने जोर देकर कहा कि कबीर ने समाज को जाति-पाति और संप्रदाय की संकीर्ण दीवारों को तोड़कर मनुष्य को केवल मनुष्य के रूप में देखने की एक नई और क्रांतिकारी दृष्टि दी।
मोक्ष स्थान विशेष का नहीं, आचरण का विषय: प्रो. आनंद शंकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग के प्रोफेसर सत्यपाल शर्मा ने विशिष्ट वक्ता के रूप में कबीर की काव्य परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कबीर का साहित्य भारतीय जनजीवन की सामूहिक चेतना का सच्चा आईना है। कार्यक्रम के संयोजक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग के प्रोफेसर आनंद शंकर चौधरी ने काशी और मगहर के सांस्कृतिक महत्व को जोड़ते हुए एक बेहद मार्मिक बात कही। उन्होंने कहा कि कबीर ने अपने जीवन और महाप्रयाण (मृत्यु) के माध्यम से सदियों पुराने इस भ्रम को तोड़ा कि मोक्ष किसी खास जगह पर जाने से मिलता है; उन्होंने सिद्ध किया कि मोक्ष स्थान का नहीं, बल्कि आपके पवित्र आचरण और आत्मज्ञान का विषय है।
भजन और लोक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भक्तिमय हुआ माहौल नई दिल्ली के पांडवकालीन भगवान वाल्मीकि आश्रम से आए विशेष अतिथि महामंडलेश्वर स्वामी विवेक नाथ जी महाराज ने भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित किया। संगोष्ठी के साथ-साथ महोत्सव के दूसरे दिन कबीर भजनों, संत सम्मेलन और लोक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। देश के कोने-कोने से आए लोक कलाकारों ने जब कबीर की साखियों और वाणियों को सुरों में पिरोया, तो पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। महोत्सव के सूत्रधार और कबीर प्राकट्य स्थली (लहरतारा) के पीठाधीश्वर महंत गोविंद दास शास्त्री ने श्रद्धालुओं को कबीर साहेब के दिखाए रास्ते पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि कबीर साहेब की वाणियों को केवल सुनना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें अपने व्यावहारिक जीवन में उतारकर ही हम अपने जीवन को सार्थक और सुंदर बना सकते हैं। अंत में आयोजकों ने यह संकल्प दोहराया कि कबीर की समरसतामूलक विरासत और उनके संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक आयोजन भविष्य में भी निरंतर जारी रहेंगे।