वाराणसी: काशी में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। नगर निगम ने सूजाबाद-डोमरी इलाके में करीब 350 बीघा भूमि पर विशाल ‘अर्बन फॉरेस्ट’ विकसित करने की योजना तैयार की है। यह परियोजना जहां शहर की हवा को स्वच्छ बनाएगी, वहीं नगर निगम के लिए स्थायी आय का स्रोत भी बनेगी। अनुमान है कि सातवें वर्ष तक निगम को प्रतिवर्ष लगभग सात करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो सकता है।
इस संबंध में शुक्रवार को महापौर अशोक कुमार तिवारी ने अधिकारियों के साथ बैठक कर परियोजना की रूपरेखा पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि इस योजना के लिए मध्यप्रदेश की एमबीके संस्था के साथ करार किया गया है। समझौते के अनुसार तीसरे वर्ष से निगम को दो करोड़ रुपये की आय शुरू हो जाएगी, जो सातवें वर्ष तक बढ़कर सात करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच सकती है।
मियावाकी तकनीक से होगा विकास
परियोजना में मियावाकी पद्धति के साथ औषधीय और पुष्पीय खेती को भी शामिल किया गया है। यह केवल हरियाली बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर इको-सिस्टम तैयार करने की दिशा में पहल है। यहां घने मियावाकी वन, फलदार बाग, आयुर्वेदिक पौधों और फूलों की खेती का संयोजन देखने को मिलेगा।
एक मार्च को तीन लाख से अधिक पौधों के रोपण के साथ इस अर्बन फॉरेस्ट का औपचारिक शुभारंभ किया जाएगा। गंगा तट के समीप स्थित यह वन क्षेत्र मिट्टी के कटाव को रोकने और शहर के लिए ‘ऑक्सीजन बैंक’ की भूमिका निभाने में सहायक होगा।
गर्मी में विशेष सिंचाई व्यवस्था
मार्च से जून तक पड़ने वाली भीषण गर्मी को ध्यान में रखते हुए पौधों की सिंचाई के लिए सप्ताह में तीन बार 45 मिनट का शेड्यूल तय किया गया है। इसके लिए पांच बोरवेल और 10,827 मीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है। साथ ही 360 ‘रेन गन’ स्प्रिंकलर सिस्टम लगाए जाएंगे। वन क्षेत्र में चार किलोमीटर लंबा पाथवे भी विकसित किया जाएगा।
तीसरे वर्ष से शुरू होगी आमदनी
फलदार वृक्षों—आम, अमरूद, पपीता, अनार—के साथ अश्वगंधा, शतावरी, गिलोय, एलोवेरा जैसे औषधीय पौधों और गुलाब, चमेली, पारिजात जैसे फूलों से तीसरे वर्ष से आय शुरू होने की संभावना है। अनुमान के मुताबिक तीसरे वर्ष दो करोड़, पांचवें वर्ष पांच करोड़, छठे वर्ष छह करोड़ और सातवें वर्ष सात करोड़ रुपये तक वार्षिक आय हो सकती है।
मार्च में रोपण के पीछे वैज्ञानिक कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च के पहले सप्ताह में पौधारोपण करने से मानसून से पहले पौधों की जड़ें मजबूत हो जाती हैं। इससे उनकी जीवित रहने की दर बढ़ती है और बरसात के दौरान मिट्टी के कटाव पर भी नियंत्रण रहता है।
देशी प्रजातियों को प्राथमिकता
वन में 27 प्रकार की देशी प्रजातियां लगाई जाएंगी, जिनमें शीशम, अर्जुन, सागौन, सप्तपर्णी, बांस, पीपल, महुआ, महोगनी, अमरूद, आम, अनार, शहतूत, नींबू, करौंदा, बेल, कचनार, चांदनी, गुड़हल, हरसिंगार, बोतल ब्रश, जंगल जलेबी सहित कुल 3,17,120 पौधों का रोपण प्रस्तावित है।
परियोजना की मुख्य झलक
- कुल क्षेत्रफल: लगभग 350 बीघा
- कुल पौधे: 3,17,120
- पाइपलाइन नेटवर्क: 10,827 मीटर
- बोरवेल: 10
- रेन गन स्प्रिंकलर: 360
- पाथवे: 4 किलोमीटर
- अनुमानित आय (5 वर्षों में): 19.80 करोड़ रुपये
यह महत्वाकांक्षी योजना पर्यावरण संरक्षण, राजस्व सृजन और गंगा तट की सुरक्षा—तीनों उद्देश्यों को एक साथ साधने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।