वाराणसी। विजया एकादशी की संध्या पर काशी की गलियां भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठीं। पीली हल्दी से अलंकृत काशी विश्वनाथ मंदिर के बाबा दूल्हे के स्वरूप में विराजमान हुए तो “हर-हर महादेव” के जयघोष से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। बांसफाटक स्थित धर्म निवास से टेढ़ीनीम तक निकली भव्य शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। मार्ग भर पुष्पवर्षा के बीच भक्ति का मनोहारी दृश्य देखने को मिला।
डमरू-शंखनाद के बीच आगे बढ़ी शोभायात्रा
बांसफाटक से प्रारंभ हुई यात्रा डमरू, शंखध्वनि और जयकारों के साथ आगे बढ़ी। महिलाएं मंगलगीत गाती रहीं, जबकि युवा शिवभक्ति में लीन नजर आए। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पहुंचने पर काशी विश्वनाथ की पंचबदन चल प्रतिमा पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सगुन की हल्दी अर्पित की गई। हल्दी लगते ही बाबा का दूल्हा स्वरूप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन गया।

52 थालों में सजा विवाहोत्सव का चढ़ावा
इस आयोजन की विशेषता 52 थालों में सजा मांगलिक चढ़ावा रहा। हल्दी, चंदन, फल, मेवा और अन्य सामग्री से सुसज्जित थाल श्रद्धालुओं ने सिर पर रखकर विवाहोत्सव में सहभागिता की। बाबा के ससुराल माने जाने वाले सारंगनाथ मंदिर से पगड़ीधारी ससुरालीजन हल्दी लेकर पहुंचे। पूरा वातावरण पारंपरिक विवाह जैसा प्रतीत हुआ और भक्त भाव-विभोर हो उठे।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ भव्य श्रृंगार
टेढ़ीनीम पहुंचने पर 11 वैदिक ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक पूजन कराया। मंत्रों की अनुगूंज और दीपों की जगमगाहट के बीच बाबा का दिव्य श्रृंगार किया गया। नवरत्न जड़ित छत्र के नीचे विराजमान बाबा का स्वरूप अलौकिक और राजसी दिखा। देर रात तक श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते रहे।

शिव विवाह की रस्मों की हुई औपचारिक शुरुआत
विजया एकादशी पर चढ़ाई गई सगुन की हल्दी को शिव विवाह की रस्मों का शुभारंभ माना जाता है। अब महाशिवरात्रि तक काशी में विवाहोत्सव की तैयारियां और तेज होंगी। यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि काशी की जीवंत लोकसंस्कृति का भी प्रतीक है।
