नई दिल्ली: समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इसी बीच AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने UCC को लेकर केंद्र सरकार और इसके समर्थकों पर निशाना साधा है।
ओवैसी ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के नाम पर हिंदू कानून मुसलमानों पर लागू नहीं किए जा सकते। उनका कहना है कि इस्लाम में विवाह एक धार्मिक संस्कार नहीं बल्कि एक कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) की तरह होता है।

इस्लाम में निकाह एक अनुबंध
एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि UCC की चर्चा फिर से तेज हो गई है, लेकिन लोगों को यह समझना होगा कि इस्लाम में शादी जन्म-जन्म का बंधन नहीं बल्कि एक समझौता है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में निकाह को एक कानूनी और सामाजिक अनुबंध के रूप में देखा जाता है।
Uniform Civil Code के नाम पर हिंदू कानून, मुसलमानों पर मुसल्लत नहीं कर सकते : Barrister @asadowaisi pic.twitter.com/XQSniPcZ6D
— AIMIM (@aimim_national) March 13, 2026
हिंदू और मुस्लिम कानूनों की तुलना
ओवैसी ने दावा किया कि हिंदू कानूनों में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिन्हें मुसलमानों पर लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अदालतों में कई बार यह कहा गया है कि यदि पत्नी सास-ससुर की देखभाल नहीं करती तो इसे क्रूरता माना जा सकता है, जबकि इस्लाम में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
उनके अनुसार इस्लाम में माता-पिता की जिम्मेदारी मुख्य रूप से बेटे की होती है।
आदिवासियों पर भी उठाया सवाल
AIMIM नेता ने यह भी सवाल उठाया कि क्या हिंदू मैरिज एक्ट आदिवासी समुदायों पर लागू होगा। उन्होंने कहा कि विभिन्न समुदायों की अलग-अलग परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं हैं, इसलिए एक समान कानून लागू करना आसान नहीं है।
जेंडर जस्टिस पर सरकार को घेरा
ओवैसी ने कहा कि जो लोग जेंडर जस्टिस की बात करते हैं, उन्हें पहले मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कई मुद्दों पर सरकार और समाज की संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती, लेकिन UCC की बहस को बार-बार आगे लाया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद बढ़ी बहस
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है। अदालत ने यह भी कहा कि इस विषय पर अंतिम निर्णय लेना विधायिका यानी संसद का अधिकार है।
यह टिप्पणी 1937 के शरीयत कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान की गई थी, जिसमें कहा गया है कि कुछ प्रावधान मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण हैं।
