वाराणसी। तेजी से बदलते तकनीकी युग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच जहां पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं, वहीं काशी की धरती पर कुछ कलाकार अब भी इन विरासतों को संजोए रखने में जुटे हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है कठपुतली कलाकार मिथिलेश दुबे की, जो पिछले करीब 20 वर्षों से इस विलुप्त होती कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।
नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे संस्कृति का संदेश
मिथिलेश दुबे और उनकी टीम, जिसमें करीब 10 से 12 सदस्य शामिल हैं, ग्लव्स पपेट (दस्ताने वाली कठपुतली) के माध्यम से सामाजिक विषयों और जीवन से जुड़ी कहानियां लोगों तक पहुंचा रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूक करना भी है।
गुरु से मिली प्रेरणा, बना लिया जीवन का लक्ष्य
मिथिलेश बताते हैं कि उन्होंने यह कला पश्चिम बंगाल के अपने गुरु स्वर्गीय सुरेश दत्त से सीखी। थिएटर आर्टिस्ट रहने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कठपुतली कला धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। इसी सोच ने उन्हें इस कला को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया।
कहानी तैयार करने में लगते हैं महीनों
मिथिलेश और उनकी टीम अलग-अलग विषयों पर आधारित प्रस्तुतियां तैयार करती है। एक छोटी कहानी तैयार करने में जहां 2 से 3 महीने का समय लगता है, वहीं किसी ऐतिहासिक या विशिष्ट व्यक्तित्व पर आधारित प्रस्तुति बनाने में करीब एक साल तक का समय लग जाता है। वर्तमान में उनकी टीम सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन पर आधारित प्रस्तुति तैयार कर रही है।
कठपुतली कला के चार प्रमुख रूप
- धागों से संचालित (स्ट्रिंग)
- दस्ताने वाली (ग्लव्स)
- परछाई आधारित (शैडो)
- छड़ी वाली (रॉड)
उत्तर प्रदेश में खासतौर पर ग्लव्स पपेट काफी लोकप्रिय है, जिसमें कलाकार उंगलियों के जरिए पात्रों को जीवंत बनाते हैं।
देशभर में कर चुके हैं प्रस्तुतियां
मिथिलेश दुबे अब तक देश के 18 राज्यों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। वे समय-समय पर वर्कशॉप आयोजित कर बच्चों और युवाओं को इस कला से परिचित कराते हैं और अब तक 50 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दे चुके हैं।
आर्थिक चुनौतियां बनी सबसे बड़ी बाधा
हालांकि, मिथिलेश मानते हैं कि इस कला से जुड़े कलाकारों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होती, जिसके कारण नई पीढ़ी इसमें कम रुचि ले रही है। उनका कहना है कि यदि सरकार और सामाजिक संस्थाएं सहयोग करें तो इस पारंपरिक कला को न केवल बचाया जा सकता है, बल्कि इसे रोजगार का माध्यम भी बनाया जा सकता है।
