• Banaras Now, Varanasi
  • July 14, 2026

वाराणसी। संत शिरोमणि कबीर साहेब के तीन दिवसीय प्राकट्य महोत्सव के दूसरे दिन लहरतारा स्थित कबीर प्राकट्य स्थली भक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम की गवाह बनी। इस पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के स्टांप एवं पंजीकरण मंत्री रवींद्र जायसवाल ने महोत्सव में शिरकत की और कबीर साहेब के चरणों में मत्था टेककर आशीर्वाद लिया। कबीर प्राकट्य स्थली के विकास पर बात करते हुए मंत्री जायसवाल ने कहा कि इस पवित्र स्थल का पहले के मुकाबले काफी विकास हो चुका है और आने वाले समय में उत्तर प्रदेश सरकार इसे और भव्य रूप देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
महोत्सव के दूसरे दिन का मुख्य आकर्षण “कबीर की विरासत: काशी से मगहर तक—इतिहास, स्मृति और लोक परंपरा” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी रही। संत कबीर प्राकट्य स्थली (लहरतारा), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और संत कबीर अकादमी (मगहर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बौद्धिक परिचर्चा में देश भर से आए विद्वानों, शोधार्थियों, सामाजिक चिंतकों और संत-महात्माओं ने कबीर के विचारों पर गहराई से मंथन किया।


कबीर की वाणी केवल साहित्य नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का माध्यम: प्रो. बिहारी लाल शर्मा
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कबीर साहेब को भारतीय संस्कृति का महान लोकनायक बताया। उन्होंने कहा कि कबीर ने मानवता, समानता और आध्यात्मिक स्वतंत्रता का जो संदेश दिया, उसकी प्रासंगिकता आज के दौर में और अधिक बढ़ गई है। कबीर की वाणी केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह समाज को बदलने और आत्मबोध कराने का एक सशक्त माध्यम है। वहीं मुख्य अतिथि प्रोफेसर एस. एन. संखवार ने जोर देकर कहा कि कबीर ने समाज को जाति-पाति और संप्रदाय की संकीर्ण दीवारों को तोड़कर मनुष्य को केवल मनुष्य के रूप में देखने की एक नई और क्रांतिकारी दृष्टि दी।


मोक्ष स्थान विशेष का नहीं, आचरण का विषय: प्रो. आनंद शंकर
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग के प्रोफेसर सत्यपाल शर्मा ने विशिष्ट वक्ता के रूप में कबीर की काव्य परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कबीर का साहित्य भारतीय जनजीवन की सामूहिक चेतना का सच्चा आईना है। कार्यक्रम के संयोजक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग के प्रोफेसर आनंद शंकर चौधरी ने काशी और मगहर के सांस्कृतिक महत्व को जोड़ते हुए एक बेहद मार्मिक बात कही। उन्होंने कहा कि कबीर ने अपने जीवन और महाप्रयाण (मृत्यु) के माध्यम से सदियों पुराने इस भ्रम को तोड़ा कि मोक्ष किसी खास जगह पर जाने से मिलता है; उन्होंने सिद्ध किया कि मोक्ष स्थान का नहीं, बल्कि आपके पवित्र आचरण और आत्मज्ञान का विषय है।


भजन और लोक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भक्तिमय हुआ माहौल
नई दिल्ली के पांडवकालीन भगवान वाल्मीकि आश्रम से आए विशेष अतिथि महामंडलेश्वर स्वामी विवेक नाथ जी महाराज ने भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित किया। संगोष्ठी के साथ-साथ महोत्सव के दूसरे दिन कबीर भजनों, संत सम्मेलन और लोक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। देश के कोने-कोने से आए लोक कलाकारों ने जब कबीर की साखियों और वाणियों को सुरों में पिरोया, तो पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।
महोत्सव के सूत्रधार और कबीर प्राकट्य स्थली (लहरतारा) के पीठाधीश्वर महंत गोविंद दास शास्त्री ने श्रद्धालुओं को कबीर साहेब के दिखाए रास्ते पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि कबीर साहेब की वाणियों को केवल सुनना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें अपने व्यावहारिक जीवन में उतारकर ही हम अपने जीवन को सार्थक और सुंदर बना सकते हैं। अंत में आयोजकों ने यह संकल्प दोहराया कि कबीर की समरसतामूलक विरासत और उनके संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस तरह के वैचारिक और सांस्कृतिक आयोजन भविष्य में भी निरंतर जारी रहेंगे।

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