वाराणसी: मणिकर्णिका महाश्मशान में नगरवधुओं का नृत्य, 400 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवित
बनारस एक ऐसा शहर है जहां हर परंपरा अनोखी और रहस्यमयी है। भगवान शिव की नगरी काशी में जीवन और मृत्यु दोनों को समान भाव से स्वीकार किया जाता है। इसी कड़ी में मणिकर्णिका महाश्मशान में नगरवधुओं का नृत्य एक बेहद अनूठी परंपरा है, जो सदियों से चली आ रही है।
चैत्र नवरात्र में तीन दिवसीय आयोजन
यह आयोजन हर वर्ष चैत्र नवरात्रि के दौरान पंचमी से सप्तमी तिथि तक मसाननाथ मंदिर में होता है।
- पहला दिन: बाबा भोलेनाथ का भव्य रुद्राभिषेक
- दूसरा दिन: तंत्रोक्त विधि से पूजा और विशाल भंडारा
- तीसरा दिन: नगरवधुओं द्वारा नृत्य प्रस्तुति
जलती चिताओं के बीच नृत्य
नवरात्रि की सप्तमी तिथि को नगरवधुएं जलती चिताओं के बीच मसाननाथ बाबा के समक्ष नृत्य करती हैं। यह दृश्य अत्यंत भावनात्मक और अद्भुत होता है।
एक-एक कर कई समूहों में 10-12 नगरवधुएं अपनी प्रस्तुति देती हैं। गीत, संगीत और घुंघरुओं की ध्वनि पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है।
देश-विदेश से आती हैं प्रतिभागी
इस आयोजन में वाराणसी ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों और नेपाल से भी नगरवधुएं शामिल होती हैं।
मोक्ष की कामना से जुड़ी परंपरा
मान्यता है कि महाश्मशान में नृत्य करने से नगरवधुओं को अगले जन्म में मुक्ति और सम्मानजनक जीवन प्राप्त होता है। यह उनके लिए महादेव की साधना का एक माध्यम है।
राजा मानसिंह से जुड़ी कथा
करीब 400 वर्ष पूर्व राजा मानसिंह ने मसाननाथ मंदिर का निर्माण कराया था। उद्घाटन के समय कोई भी कलाकार महाश्मशान में प्रस्तुति देने को तैयार नहीं हुआ।
तब नगरवधुओं ने आगे बढ़कर नृत्य प्रस्तुत किया। उनके साहस और श्रद्धा से प्रभावित होकर राजा ने उन्हें सम्मानित किया और हर वर्ष यह परंपरा निभाने का आग्रह किया।
काशी की अनूठी पहचान
मणिकर्णिका घाट वह स्थान है जहां लोग मृत्यु के बाद मोक्ष की कामना लेकर आते हैं, लेकिन नगरवधुएं जीवित रहते हुए ही मोक्ष की इच्छा लेकर यहां पहुंचती हैं।
यह परंपरा काशी के उस दर्शन को जीवंत करती है, जहां मृत्यु भी उत्सव है और हर अंत एक नई शुरुआत।
