• Banaras Now, Varanasi
  • April 18, 2026

वाराणसी: आईएमएस बीएचयू के ट्रॉमा सेंटर में चिकित्सकीय लापरवाही का गंभीर मामला सामने आया है। यहां स्पाइनल कॉर्ड ट्यूमर से पीड़ित 71 वर्षीय राधिका देवी की जगह उनके पैर का ऑपरेशन कर दिया गया। दरअसल, अस्पताल में एक ही नाम की दो महिलाएं भर्ती थीं—एक को स्पाइनल ट्यूमर था, जबकि दूसरी के पैर में फ्रैक्चर था।

बताया जा रहा है कि 7 मार्च को फ्रैक्चर वाले मरीज की सर्जरी होनी थी, लेकिन गलती से ट्यूमर से पीड़ित राधिका देवी को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। सर्जरी के दौरान जब डॉक्टरों को पैर में कोई फ्रैक्चर नहीं मिला तो उन्हें संदेह हुआ कि मरीज बदल गई है। इसके बाद जल्दबाजी में ऑपरेशन रोककर पैर को सिल दिया गया और मरीज को बाहर भेज दिया गया। बाद में 18 मार्च को उसकी न्यूरो सर्जरी की गई, लेकिन हालत बिगड़ने के बाद 27 मार्च को उसकी मौत हो गई।

कुलपति ने रिपोर्ट मांगी तो लापरवाही आई सामने

मृतक महिला बलिया की रहने वाली थीं। उनके पोते मृत्युंजय पाल ने इस मामले की शिकायत बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी और आईएमएस के निदेशक प्रो. एसएन संखवार से की। कुलपति द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने पर पूरे मामले में लापरवाही उजागर हो गई।

इतना ही नहीं, जांच प्रक्रिया में भी गंभीर अनियमितता सामने आई। जिस डॉक्टर की टीम पर गलत ऑपरेशन का आरोप था, उसी टीम के प्रमुख डॉ. अमित रस्तोगी को जांच समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। हालांकि मामला सामने आने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया और जांच अधिकारी बदल दिया गया।

हॉस्पिटल स्टाफ ने परिजनों से किया अभद्र व्यवहार

राधिका देवी को स्पाइनल ट्यूमर की शिकायत थी। उनके पोते उन्हें 25 फरवरी को ट्रॉमा सेंटर लेकर आए थे। वहां न्यूरो सर्जरी विभाग के डॉ. अनुराग साहू को दिखाया गया, जिन्होंने उन्हें भर्ती कर लिया। जांच के बाद 7 मार्च को ऑपरेशन की तारीख तय की गई थी। शिकायत के अनुसार, ऑपरेशन न्यूरो सर्जरी टीम को करना था, लेकिन ऑर्थोपेडिक्स विभाग की टीम मरीज को ऑपरेशन थिएटर में ले गई।

परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले जरूरी कागजी प्रक्रिया और सहमति के बावजूद उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई। जब उन्होंने ऑपरेशन के बारे में पूछताछ की तो वहां मौजूद स्टाफ ने उनके साथ अभद्र व्यवहार भी किया।

18 मार्च को दोबारा न्यूरो सर्जरी, 27 को मौत

गलत सर्जरी के बाद मरीज की हालत लगातार बिगड़ती चली गई। उसे अल्सर, याददाश्त में कमी, जबड़े में कंपन, मुंह में दर्द और सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएं होने लगीं। इसके बाद 18 मार्च 2026 को दोबारा न्यूरो सर्जरी की गई। ऑपरेशन के बाद वह करीब एक सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रहीं। 27 मार्च की सुबह उन्हें सांस लेने में परेशानी हुई और कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट के कारण उनकी मौत हो गई।

ट्रॉमा सेंटर प्रभारी प्रो. सौरभ सिंह ने कुलपति को भेजी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि गलत सर्जरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, न्यूरो सर्जरी विभाग में भर्ती राधिका देवी की उम्र 71 वर्ष थी, जबकि ऑर्थोपेडिक्स विभाग में भर्ती दूसरी राधिका की उम्र 32 वर्ष थी। 7 मार्च को दोपहर 12:45 बजे ऑर्थोपेडिक्स टीम द्वारा सर्जरी शुरू की गई। जांघ में चीरा लगाने के बाद जब हड्डी सामान्य मिली, तब गलती का पता चला और तुरंत ऑपरेशन रोक दिया गया।

जांच रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई

मामले की जांच के लिए आईएमएस निदेशक ने 2 अप्रैल को चार सदस्यीय फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी का गठन किया। इसमें ऑर्थोपेडिक्स विभाग के प्रो. अमित रस्तोगी को अध्यक्ष, न्यूरोसर्जरी के प्रो. कुलवंत सिंह और डेंटल फैकल्टी के प्रो. अजीत विक्रम परिहार को सदस्य तथा ट्रॉमा सेंटर के सहायक कुलसचिव को सचिव बनाया गया। कमेटी को 10 दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया।

हालांकि बाद में प्रो. अमित रस्तोगी ने खुद ही यह जानकारी दी कि जिस सर्जरी में गलती हुई है, वह उनकी ही टीम ने की थी। इसके बाद उन्हें समिति के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और नए अध्यक्ष की नियुक्ति की गई। अब जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

शिकायत के बावजूद कार्रवाई स्पष्ट नहीं

प्रशासन ने सभी विभागों को निर्देश दिया है कि सर्जरी से पहले ‘सर्जिकल सेफ्टी चेकलिस्ट’ का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही मरीज की पहचान और प्रक्रिया की पुष्टि के बाद ही ऑपरेशन किया जाए। किसी भी स्तर पर लापरवाही पाए जाने पर संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

वहीं मृतका के पोते मृत्युंजय पाल का कहना है कि इतने बड़े संस्थान में इस तरह की गलती बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि दोषियों पर क्या कार्रवाई की जा रही है।

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