• Banaras Now, Varanasi
  • April 18, 2026

कानपुर: अवैध तरीके से किए गए किडनी ट्रांसप्लांट के बाद 43 वर्षीय पारुल तोमर की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है। उन्हें हैलेट के मल्टी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के पोस्ट-ऑपरेटिव आइसोलेशन वार्ड में रखा गया है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने मरीज की नाजुक स्थिति को देखते हुए उसे एसजीपीजीआई भेजने के लिए सीएमओ को पत्र लिखा है।

डोनर आयुष चौधरी (24) को भी एसजीपीजीआई रेफर करने की तैयारी है। डॉक्टरों के अनुसार मरीज के इलाज के लिए जरूरी संसाधनों की कमी है। साथ ही अब तक क्या इलाज हुआ और कौन-कौन सी दवाएं दी गईं, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है। प्रत्यारोपित किडनी फिलहाल काम नहीं कर रही है और पेशाब का निर्माण नहीं हो पा रहा है। मरीज का ब्लड प्रेशर भी अस्थिर बना हुआ है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किडनी रिजेक्शन की आशंका भी हो सकती है। वहीं डोनर आयुष को हैलेट के यूरो सर्जन डॉ. अनिल जे. वैद्य की निगरानी में भर्ती किया गया है और उसकी हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है।

दो साल में 10 नर्सिंग होम में 50 से ज्यादा ट्रांसप्लांट

जांच में सामने आया है कि कानपुर के करीब 10 नर्सिंग होम में पिछले दो वर्षों के दौरान 50 से अधिक किडनी ट्रांसप्लांट किए गए। इनमें आहूजा हॉस्पिटल के अलावा शहर के कई अन्य निजी अस्पताल और लखनऊ का एक प्रतिष्ठित अस्पताल शामिल हैं। डीसीपी पश्चिम एसएम कासिम आबिदी के अनुसार आहूजा अस्पताल का कर्मचारी शिवम अग्रवाल इस पूरे नेटवर्क से जुड़ा हुआ था और खुद को डॉक्टर बताकर लोगों को गुमराह करता था। इसी के जरिए उसने दिल्ली, नोएडा और मेरठ के दलालों व डॉक्टरों से संपर्क स्थापित किया।

बाहर से आती थी डॉक्टरों की टीम

जांच में यह भी पता चला है कि मेरठ, नोएडा और दिल्ली से सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, ओटी स्टाफ और नर्सें तय समय पर कानपुर पहुंचती थीं। निर्धारित नर्सिंग होम में ऑपरेशन करने के बाद वे वापस लौट जाती थीं। इसके बाद मरीज और डोनर को अलग-अलग निजी अस्पतालों में भर्ती कराया जाता था। पूरी प्रक्रिया में न तो मरीज की फाइल बनाई जाती थी और न ही डोनर का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार किया जाता था। सर्जरी के बाद साधारण कागज पर इलाज का विवरण लिखकर काम चलाया जाता था।

एनसीआर के बड़े डॉक्टर पर शक

स्वास्थ्य विभाग की जांच टीम को ऑपरेशन में इस्तेमाल की गई उन्नत तकनीक देखकर संदेह हुआ है कि इसमें एनसीआर का कोई अनुभवी डॉक्टर शामिल हो सकता है। इस संबंध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और सर्जन संगठनों से जानकारी जुटाई जा रही है।

डायलिसिस मरीजों को बनाते थे निशाना

यह गिरोह खासतौर पर उन लोगों को तलाशता था जिन्हें पैसों की जरूरत हो या जिनकी किडनी खराब हो चुकी हो। नौकरीपेशा लोगों और छात्रों के जरिए जरूरतमंद डोनर खोजे जाते थे। डायलिसिस केंद्रों से मरीजों की जानकारी लेकर उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर संपर्क किया जाता था और फिर सौदा तय किया जाता था।

डॉ. प्रीति की कई संस्थाओं में सक्रियता

मामले में नाम सामने आने वाली डॉ. प्रीति आहूजा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मेडिकल ऑफिसर भी हैं। वह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की स्थानीय शाखा की उपाध्यक्ष और कानपुर डायबिटीज एसोसिएशन की सचिव हैं। इसके अलावा वह फिजिशियन फोरम की सदस्य भी बताई जा रही हैं।

टेलीग्राम के जरिए चलता था नेटवर्क

पुलिस के मुताबिक इस रैकेट से जुड़े लोग टेलीग्राम के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क में रहते थे। आरोपी जरूरतमंद लोगों से 5 से 10 लाख रुपये में किडनी खरीदते थे और इसे अमीर मरीजों को 60 लाख से एक करोड़ रुपये तक में बेचते थे। पुलिस ट्रांसप्लांट करने वाले डॉ. रोहित और मरीज से संपर्क कराने वाले नोएडा के अफजाल, वैभव और अनुराग की तलाश कर रही है। बताया गया कि आयुष को छह लाख रुपये में किडनी देने के लिए तैयार किया गया था।

विदेशी महिला का भी हुआ था ट्रांसप्लांट

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि केशवपुरम स्थित आहूजा हॉस्पिटल में पिछले करीब दो साल से अवैध ट्रांसप्लांट का नेटवर्क सक्रिय था। दिल्ली, मेरठ और नोएडा से मरीजों व डोनरों को लाकर यहां ऑपरेशन किए जाते थे। इसी साल 3 मार्च को दक्षिण अफ्रीका की एक महिला का भी यहां किडनी ट्रांसप्लांट किया गया था। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है।

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