• Banaras Now, Varanasi
  • August 28, 2026

वाराणसी: अनादिकाल से धर्म, दर्शन और ज्ञान की वैश्विक राजधानी रही काशी का इतिहास केवल मोक्ष और अध्यात्म तक सीमित नहीं है। भारत के स्वाधीनता संग्राम के कालखंड में गंगा के इस प्राचीन तट ने देश के राजनीतिक, सामाजिक और क्रांतिकारी चिंतन को एक नई दिशा दी थी। जब समूचा भारत विदेशी हुकूमत की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब काशी ने एक ऐसा वैचारिक और व्यावहारिक केंद्र बनकर काम किया, जहां अहिंसा और सशस्त्र क्रांति की धाराएं एक साथ प्रवाहित होती थीं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता समर से लेकर 1947 के आज़ादी के प्रभात तक, काशी की गलियां, घाट और शिक्षण संस्थान ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे।

काशी का पहला प्रखर योगदान 1857 की क्रांति में उस समय सामने आया, जब यहां के भदैनी घाट पर जन्मी ‘मनु’ यानी मणिकर्णिका ने आगे चलकर वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई बनकर ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं। बनारस की माटी में पली-बढ़ी इस बेटी का साहस आगे चलकर पूरे देश के लिए प्रेरणा बना। इसी दौर में जब काशी छावनी के सैनिकों ने बगावत की, तो स्थानीय नागरिकों ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के सामने झुकने के बजाय विद्रोहियों को खुला समर्थन और संरक्षण दिया। इस चिंगारी ने भविष्य के लिए काशी को प्रतिरोध की एक स्वाभाविक भूमि के रूप में स्थापित कर दिया।

बीसवीं सदी की शुरुआत में जब देश में क्रांतिकारी आंदोलनों की नई लहर उठी, तब काशी क्रांतिकारियों का सबसे मजबूत गढ़ बन गई। शचींद्रनाथ सान्याल ने काशी को केंद्र बनाकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नींव रखी। काशी की भूलभुलैया जैसी तंग गलियां और गंगा के रहस्यमयी घाट क्रांतिकारियों के लिए सबसे सुरक्षित आश्रय स्थल बन गए। यहीं गंगा किनारे मन्मथनाथ गुप्त, राजेंद्र लाहिड़ी और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे वीरों ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने की गुप्त योजनाएं बनाईं। इसी धरती पर मात्र पंद्रह वर्ष के चंद्रशेखर तिवारी ने अदालत में अपना नाम ‘आज़ाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और पता ‘जेलखाना’ बताकर काशी के आत्मसम्मान और अदम्य साहस का ऐतिहासिक परिचय दिया था।

गांधीवादी आंदोलनों के दौर में काशी ने वैचारिक और शैक्षणिक आत्मनिर्भरता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। जब असहयोग आंदोलन के दौरान विदेशी शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान हुआ, तब राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त और डॉ. भगवान दास के प्रयासों से 1921 में काशी विद्यापीठ की स्थापना हुई। महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटित इस संस्थान ने देश को लाल बहादुर शास्त्री, कमलापति त्रिपाठी और आचार्य नरेंद्र देव जैसे शीर्ष नेतृत्वकर्ता दिए। वहीं दूसरी ओर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने न केवल राष्ट्रीय चेतना को सींचा, बल्कि इसके छात्र और प्राध्यापक हर बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आए।

1920 में काशी से शुरू हुआ राष्ट्रयज्ञ

काशी की कलम ने भी स्वाधीनता आंदोलन में अपनी अमिट छाप छोड़ी। 1920 में शुरू हुए दैनिक ‘आज’ और उसके मूर्धन्य संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर ने पत्रकारिता को राष्ट्रयज्ञ का रूप दे दिया। ब्रिटिश हुकूमत के कड़े प्रतिबंधों और सेंसरशिप के बावजूद काशी से निकलने वाले अखबारों और पर्चों ने जनमानस में देशभक्ति की अलख जगाई। साहित्य के क्षेत्र में भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद जैसे महान रचनाकारों ने इसी पावन भूमि पर बैठकर औपनिवेशिक शोषण और सामाजिक रूढ़ियों पर कड़े प्रहार किए, जिससे जनचेतना को एक सशक्त बौद्धिक आधार मिला।

बीएचयू और काशी विद्यापीठ के छात्रों ने फहराया तिरंगा

1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में काशी का जनविद्रोह अपने चरम पर था। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे के बाद जब सभी शीर्ष नेताओं को जेल में डाल दिया गया, तब काशी की आम जनता और छात्रों ने कमान अपने हाथों में ले ली। बीएचयू और काशी विद्यापीठ के विद्यार्थियों ने संचार माध्यमों को ठप कर दिया, रेलवे पटरियों को उखाड़ फेंका और सरकारी कार्यालयों पर तिरंगा फहराया। दशाश्वमेध घाट से लेकर लंका तक पूरा शहर ब्रिटिश पुलिस की बंदूकों और लाठियों के सामने बिना किसी भय के डट गया। दमन चक्र चला, सैकड़ों लोगों को जेलों में ठूंसा गया और कई वीरों ने प्राणों की आहुति दी, लेकिन शहर का हौसला नहीं टूटा।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काशी का योगदान किसी एक वर्ग या विचारधारा तक सीमित नहीं था। यह साधु-संतों, विचारकों, छात्रों, साहित्यकारों और जांबाज क्रांतिकारियों का वह साझा मोर्चा था, जिसने आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। गंगा की बहती धारा की तरह काशी का यह स्वाभिमान और त्याग आज भी भारतीय इतिहास में अमर है।

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