होलिका दहन की तिथि को लेकर इस बार लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वजह यह है कि 2 और 3 मार्च दोनों ही दिन पूर्णिमा तिथि पड़ रही है, जबकि 3 मार्च को चंद्रग्रहण भी लगने वाला है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर होलिका दहन किस दिन किया जाए। पंडित राकेश झा के अनुसार, इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को करना अधिक शुभ और शास्त्र सम्मत रहेगा, क्योंकि इस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि का संयोग बन रहा है।
पूर्णिमा और चंद्रग्रहण के कारण बढ़ा संशय
2 और 3 मार्च दोनों दिन पूर्णिमा तिथि रहने से लोगों में भ्रम की स्थिति बनी है। साथ ही 3 मार्च को लगने वाला चंद्रग्रहण भी निर्णय को लेकर असमंजस पैदा कर रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ग्रहण काल में शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं, इसलिए होलिका दहन जैसे धार्मिक अनुष्ठान के लिए ग्रहण रहित समय का चयन आवश्यक है।
2 या 3 मार्च 2026: कब करें होलिका दहन?
पंडित राकेश झा बताते हैं कि पूर्णिमा तिथि 2 और 3 मार्च दोनों दिन रहेगी, लेकिन 3 मार्च को प्रदोष काल शुरू होने से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो जाएगी। धर्म सिंधु ग्रंथ में उल्लेख है कि यदि दो दिनों तक पूर्णिमा रहे और पहले दिन प्रदोष काल का स्पर्श हो जबकि दूसरे दिन न हो, तो पहले दिन ही भद्रा रहित समय में होलिका दहन करना चाहिए।
हालांकि इस बार 2 मार्च को पूर्णिमा के साथ भद्रा का प्रभाव भी रहेगा, लेकिन शास्त्रों में भद्रा मुख को छोड़कर प्रदोष काल में होलिका दहन करने की अनुमति दी गई है।
प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त
भद्रा मुख 2 मार्च की अर्धरात्रि के बाद 2 बजकर 38 मिनट से प्रारंभ होकर 3 मार्च की सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। वहीं 2 मार्च को शाम 6 बजकर 22 मिनट से 8 बजकर 53 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा। यही समय होलिका दहन के लिए शुभ और शास्त्र सम्मत माना जा रहा है।
होलिका दहन का धार्मिक महत्व
होलिका दहन केवल रंगों के त्योहार की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी है। पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप नामक एक शक्तिशाली असुर ने कठोर तपस्या कर ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसे न मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में मृत्यु हो, न रात में; न घर के भीतर मारा जाए, न बाहर; और न किसी अस्त्र-शस्त्र से उसका अंत हो। वरदान पाकर वह स्वयं को ईश्वर समझने लगा।
उसने अपने राज्य में भगवान की उपासना पर रोक लगा दी। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पुत्र की भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई।
इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष होलिका दहन किया जाता है, जो सत्य, भक्ति और धर्म की विजय का संदेश देता है।
