वाराणसी। देश के सबसे संवेदनशील मामलों में से एक ज्ञानवापी मस्जिद-श्रृंगार गौरी विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने की कोशिशें महज 7 मिनट के भीतर पूरी तरह नाकाम हो गईं। सुप्रीम कोर्ट की पहल पर वाराणसी के सिविल कोर्ट स्थित मेडिएशन सेंटर में मंगलवार (14 जुलाई) को बुलाई गई विशेष बैठक में हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही पक्षों ने समझौते की गुंजाइश को सिरे से खारिज कर दिया। दोपहर ठीक 2:00 बजे जैसे ही मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे जज मुकुल आनंद पांडेय ने दोनों पक्षों से बात शुरू की, वैसे ही गतिरोध खुलकर सामने आ गया और बिना किसी नतीजे के चंद मिनटों में ही यह बैठक समाप्त हो गई।
7 मिनट का घटनाक्रम: जज के सवाल पर दोनों पक्षों का दोटूक जवाब
न्यायालय परिसर के मनोरंजन कक्ष में दोपहर 1:36 बजे सबसे पहले मुस्लिम पक्ष (अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी) के अधिवक्ता पहुंचे। इसके ठीक बाद दोपहर 1:55 बजे हिंदू पक्ष की वादिनी महिलाएं—रेखा पाठक, लक्ष्मी देवी, सीता और मंजू व्यास अपने वकीलों सुधीर त्रिपाठी और सुभाष नंदन के साथ जयकारा लगाते हुए वहां दाखिल हुईं। ठीक 2:00 बजे न्यायिक अधिकारी मुकुल आनंद पांडेय ने सबसे पहले मुस्लिम पक्ष से मध्यस्थता के जरिए विवाद खत्म करने की संभावना पर राय मांगी। मुस्लिम पक्ष ने तुरंत इनकार करते हुए कहा कि वे किसी समझौते के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बाद जब हिंदू पक्ष के सामने यही प्रस्ताव रखा गया, तो उन्होंने भी असहमति जता दी। दोनों पक्षों का रुख भांपकर जज अपनी कुर्सी से उठ गए और महज 7 मिनट में पूरी प्रक्रिया समाप्त हो गई।
अपने-अपने दावों पर अड़े दोनों पक्ष, समझौते से पूरी तरह इनकार
इस विवाद को लेकर दोनों पक्ष अपने पुराने दावों पर पूरी मजबूती से कायम हैं। उत्तर प्रदेश शासन के स्पेशल काउंसिल राजेश मिश्र ने बताया कि इस ‘प्री-मीडिएशन’ बैठक में सुलह की कोई संभावना नहीं दिखी। मुस्लिम पक्ष का स्पष्ट कहना है कि वह स्थान हमेशा से मस्जिद रहा है और मस्जिद ही रहेगा। दूसरी तरफ, हिंदू पक्ष ने दलील दी कि वैज्ञानिक और एएसआई (ASI) सर्वे की रिपोर्ट में वहां प्राचीन मंदिर के स्पष्ट अवशेष और शिवलिंग मिले हैं, इसलिए वह परिसर हिंदू समाज को सौंप दिया जाना चाहिए। दोनों पक्षों ने अब साफ़ कर दिया है कि वे केवल देश की उच्च अदालतों (हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) के कानूनी फैसले को ही स्वीकार करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के ‘समाधान समारोह’ पर सस्पेंस
दरअसल, देश की सर्वोच्च अदालत (सुनीम कोर्ट) ने इस विवाद को लेकर सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर 14 जुलाई को जिला जज के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया था। हालांकि, अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने पहले ही एक आधिकारिक पत्र जारी कर स्पष्ट कर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट का यह आमंत्रण बाध्यकारी (Mandatory) नहीं है, इसलिए वे लोक अदालत के माध्यम से आयोजित होने वाले किसी भी समाधान समारोह का हिस्सा नहीं बनेंगे। अब यह मामला वापस न्यायिक प्रक्रिया में लौट आया है। आगामी 21, 22 और 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट परिसर में आयोजित होने वाले ‘समाधान समारोह’ में इस केस को शामिल किया जाएगा या नहीं, यह पूरी तरह से शीर्ष अदालत की इच्छा पर निर्भर करेगा।
जानिए 1991 से 2024 तक क्या-क्या हुआ:
ज्ञानवापी का यह कानूनी सफर दशकों पुराना है, जिसकी मुख्य कड़ियां इस प्रकार हैं:
- 1991: वाराणसी जिला कोर्ट में लॉर्ड विश्वेश्वरनाथ का मुकदमा दायर कर पहली बार परिसर में नियमित पूजा-पाठ करने की अनुमति मांगी गई।
- 1993: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दखल देते हुए विवादित परिसर में यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया।
- 2018: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी स्टे ऑर्डर की वैधता केवल 6 महीने तक ही प्रभावी रहेगी।
- 2019: वाराणसी की जिला अदालत में इस मामले पर नए सिरे से कानूनी सुनवाई का सिलसिला दोबारा बहाल हुआ।
- 2023: जिला जज की अदालत ने एक बड़ा फैसला लेते हुए सील वजूखाने को छोड़कर पूरे ज्ञानवापी परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने की जिम्मेदारी एएसआई (ASI) को सौंपी। इसी दौरान हाईकोर्ट ने 1991 के पुराने मामले से स्टे हटाकर रिपोर्ट निचली अदालत में सौंपने का निर्देश दिया।
- 2024: जिला अदालत के आदेश के बाद एएसआई द्वारा तैयार की गई विस्तृत सर्वे रिपोर्ट को दोनों पक्षों के अध्ययन के लिए आधिकारिक तौर पर उपलब्ध करा दिया गया।
