वाराणसी। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन अत्यधिक जलाभिषेक के कारण बीमार हुए भगवान जगन्नाथ 14 दिनों तक विश्राम और काढ़ा पीने के बाद अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं। आषाढ़ मास की अमावस्या के दिन, यानी 15वें दिन तड़के 5 बजे, कपाट खुलने के साथ ही भगवान ने अपने भक्तों को दर्शन दिए।
मंदिर के मुख्य पुजारी राधेश्याम पांडेय ने प्रभु का मनमोहक शृंगार सफेद फूलों और श्वेत वस्त्रों से किया। इसके पश्चात पंचामृत का भोग लगाकर भव्य आरती संपन्न की गई, जिसे बाद में भक्तों के बीच प्रसाद रूप में बांटा गया। प्रभु को स्वास्थ्य लाभ के लिए आज विशेष रूप से परवल के जूस का भी भोग लगाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार, कल भगवान की डोली निकाली जाएगी और 16 से 18 जुलाई तक चलने वाले ऐतिहासिक रथयात्रा मेले में भगवान रथ पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देंगे।

क्या है काशी के इस जगन्नाथ मंदिर का इतिहास?
इस मंदिर की स्थापना की कहानी 1765 के आसपास शुरू होती है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के तत्कालीन मुख्य पुजारी ब्रह्मचारी जी का वहां के राजा से किसी बात पर विवाद हो गया था। इसके बाद वे पुरी छोड़कर काशी चले आए और अपने साथ भगवान वासुदेव, भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा जी की प्रतिमाओं का प्रतिरूप ले आए। काशी में वे गंगा किनारे अस्सी घाट पर निवास करने लगे।
कुछ समय बाद पुरी के राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने हर हफ्ते बनारस में ‘बहंगी’ (भगवान का प्रसाद) भेजना शुरू कर दिया। ब्रह्मचारी जी का नियम था कि वे केवल पुरी के भगवान जगन्नाथ को चढ़ा हुआ प्रसाद ही ग्रहण करते थे। एक बार उड़ीसा में भयंकर चक्रवात और बाढ़ आ गई, जिसके कारण कई हफ्तों तक बहंगी काशी नहीं पहुंच सकी और पुजारी जी को भूखा रहना पड़ा। इसी दौरान उन्हें स्वप्न में भगवान ने काशी में ही मंदिर बनाने और यहीं भोग लगाने का आदेश दिया।

भोंसले राजवंश ने कराया था निर्माण
मंदिर परिसर में लगे घंटे पर दर्ज जानकारी के मुताबिक, इसका निर्माण कार्य 1768 में शुरू हुआ था। पुजारी जी ने मंदिर निर्माण के लिए छत्तीसगढ़ के भोंसले साम्राज्य से सहायता मांगी थी। राजा व्यंकोजी भोंसले ने इसके लिए प्रचुर धन उपलब्ध कराया। यही नहीं, मंदिर और रथयात्रा के सुचारू संचालन के लिए राजा ने ‘तखतपुर महाल’ दान में दे दिया, जिसके राजस्व से सारा प्रबंधन होता था। मंत्री पंडित बेनीराम और कटक के दीवान विश्वंभर पंडित की देखरेख में 1790 में यह भव्य मंदिर पूरी तरह बनकर तैयार हुआ।
1857 की क्रांति के बाद बंद हुआ राजस्व
शुरुआत में बनारस के इस मंदिर में भी पुरी की तरह ही सारे नियम लागू थे। लेकिन 1857 की क्रांति के दौरान भोंसले साम्राज्य अंग्रेजों के कब्जे में आ गया और उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई। इससे मंदिर को मिलने वाला राजस्व बंद हो गया और लंबे समय तक इसकी उपेक्षा हुई।
बाद में मंत्री बेनीराम को मंदिर का प्रबंधक बनाया गया। 1805 में बेनीराम के निधन के बाद से पिछले 221 वर्षों से उनके वंशज ही इस मंदिर की पूजा-पाठ और व्यवस्था संभाल रहे हैं। वहीं, पुजारी ब्रह्मचारी जी ने 1818 में पुरी की परिक्रमा करने के बाद काशी लौटकर अस्सी घाट पर समाधि ले ली थी। मंदिर में आज भी उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं की पूजा की जाती है।

मंदिर की वास्तुकला और अन्य प्रतिमाएं
- मुख्य मूर्तियां: गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां पूजा का विधान भी पुरी के मंदिर जैसा ही है।
- नृसिंह भगवान: मुख्य मूर्तियों के साथ ही लगभग 4 मीटर ऊंची भगवान नृसिंह और भक्त प्रह्लाद की विशाल प्रतिमा भी मौजूद है। बाहर की तरफ गरुड़ देव स्थापित हैं।
- वैष्णव देवता: मंदिर आयताकार है और इसके चारों कोनों पर वैष्णव स्वरूपों (श्री कृष्ण, राम पंचायतन, कालिया मर्दन और लक्ष्मीनारायण) की मूर्तियां विराजमान हैं।
- कॉरिडोर नुमा परिसर: इस मंदिर का मुख्य शिखर करीब 16 मीटर ऊंचा है। पूरा परिसर एक कॉरिडोर की तरह दिखता है जिसे तीन द्वार जोड़ते हैं। पहला गेट मंदिर के पट से लगभग 300 मीटर की दूरी पर है, जहां से भगवान का पट बिल्कुल सीधे दिखाई देता है।
