गाजियाबाद। देश विरोधी गतिविधियों से जुड़ा एक नया और चिंताजनक पैटर्न हालिया जांच में सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति को भी चुनौती दी है। इस नेटवर्क की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसमें शामिल लोग किसी आपराधिक पृष्ठभूमि से नहीं आते, बल्कि सामान्य जीवन जीने वाले युवा हैं, जिन्हें सोशल मीडिया के जरिए निशाना बनाकर धीरे-धीरे कट्टरपंथ की ओर धकेला जा रहा है।
कौशांबी और नाहल क्षेत्रों से पकड़े गए संदिग्धों से हुई पूछताछ में यह सामने आया है कि विदेशी हैंडलर्स एक सुनियोजित तरीके से ऐसे युवाओं को अपने जाल में फंसा रहे हैं। पहले उन्हें वैचारिक रूप से प्रभावित किया जाता है, फिर उनका ब्रेनवॉश कर उन्हें देश विरोधी गतिविधियों में शामिल किया जाता है। इस पूरे तंत्र को जांच एजेंसियां “व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल” का नाम दे रही हैं, क्योंकि इसमें शामिल लोगों का बाहरी व्यक्तित्व सामान्य और संदेह से परे होता है।
क्राइम ब्रांच और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में अब तक 21 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। ये गिरफ्तारियां बिजनौर, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, जौनपुर, मेरठ, गाजीपुर, गाजियाबाद और बिहार जैसे विभिन्न क्षेत्रों से हुई हैं। इनमें एक आरोपी नेपाल के गुल्मी जिले (लुम्बिनी क्षेत्र) का भी शामिल है। जांच में यह सामने आया है कि ये लोग इंटरनेट के माध्यम से संवेदनशील सूचनाएं आतंकी संगठनों तक पहुंचा रहे थे।
पूछताछ में यह तथ्य भी सामने आया कि इन आरोपियों में से अधिकांश कम पढ़े-लिखे हैं, जिससे वे आसानी से बहकावे में आ गए। नेपाल का रहने वाला गणेश महज पांचवीं कक्षा तक पढ़ा है और घरेलू काम करता था। वहीं विवेक पूरी तरह अशिक्षित है। गगन ने 12वीं तक और दुर्गेश ने नौवीं तक पढ़ाई की है। पकड़े गए पांच नाबालिगों में से कोई फेरी लगाकर जीवन यापन करता है तो कोई बाइक या कार मरम्मत की दुकानों पर काम करता है।
इससे पहले गिरफ्तार किए गए आरोपियों में भी समान स्थिति देखने को मिली थी। सुहेल मलिक, साने इरम उर्फ महक, प्रवीण, राज वाल्मीकि, शिवा वाल्मीकि और रितिक गंगवार जैसे नाम सामने आए, जिनमें से किसी ने भी 10वीं कक्षा से अधिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। इन सभी की उम्र 20 से 25 वर्ष के बीच बताई जा रही है।
नाहल क्षेत्र से पकड़े गए छह आरोपियों में भी विविध पृष्ठभूमि देखने को मिली। शावेज उर्फ ‘जिहादी’ एक परचून की दुकान चलाने के साथ एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था, जबकि जुनैद ने एलएलबी की पढ़ाई बीच में छोड़कर खेती शुरू कर दी थी। इकराम अली पेशे से अधिवक्ता है। मौलाना जावेद 12वीं पास है और मदरसे में बच्चों को धार्मिक शिक्षा देता था। फजरू, जो आठवीं पास है, ट्रक चलाता है, जबकि फरदीन अशिक्षित होकर मजदूरी करता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी व्यक्तियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा, जिससे वे लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बचते रहे। यही कारण है कि यह नेटवर्क पारंपरिक आतंकी मॉड्यूल से अधिक खतरनाक माना जा रहा है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस तरह के नेटवर्क के लिए सबसे बड़ा माध्यम बन चुके हैं। यहां युवाओं को पहले भावनात्मक और वैचारिक रूप से प्रभावित किया जाता है, फिर उन्हें धीरे-धीरे देश विरोधी गतिविधियों में शामिल कर लिया जाता है।
फिलहाल, सुरक्षा एजेंसियां इस नेटवर्क की गहराई तक पहुंचने और इसके विदेशी कनेक्शन को पूरी तरह उजागर करने में जुटी हैं। साथ ही, यह भी प्रयास किया जा रहा है कि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए साइबर निगरानी को और सख्त किया जाए, ताकि देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।
