वाराणसी। आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की नगरी काशी एक बार फिर धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में नई पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। शिव की नगरी, भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली और संत परंपरा की पावन भूमि काशी अब जैन धर्मावलंबियों के लिए भी आकर्षण का बड़ा केंद्र बनती जा रही है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जैन सर्किट योजना के तहत चंद्रावती में गंगा किनारे एक भव्य पक्का घाट तैयार कराया है, जिससे इस क्षेत्र को नई पहचान मिली है।
वाराणसी मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर गाजीपुर मार्ग पर स्थित चंद्रावती गांव में जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु जी की जन्मस्थली पर 17.06 करोड़ रुपये की लागत से तीन-स्तरीय आधुनिक घाट का निर्माण किया गया है। लगभग 200 मीटर लंबे इस घाट का लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित वाराणसी दौरे के दौरान किया।

चंद्रावती जैन श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यहां श्वेतांबर और दिगंबर दोनों परंपराओं के मंदिर मौजूद हैं, जहां देश और विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भगवान चंद्रप्रभु जी की जन्मभूमि पर निर्मित यह घाट धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक संरक्षण और आधुनिक सुविधाओं का बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरेगा।
यह स्थान जैन धर्म के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भगवान चंद्रप्रभु जी के चार प्रमुख कल्याणक—च्यवन, जन्म, दीक्षा और केवल ज्ञान—यहीं से संबंधित हैं। यहां स्थित प्राचीन मंदिर करीब 500 वर्षों से भी अधिक पुराना बताया जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान चंद्रप्रभु का जन्म राजा महासेन और रानी लक्ष्मणा के यहां हुआ था और उन्होंने गंगा तट पर तपस्या कर केवल ज्ञान प्राप्त किया था।

पर्यटन विभाग के अनुसार घाट के निर्माण और सुविधाओं के विस्तार से चंद्रावती आने वाले समय में प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में विकसित होगा। इसे जलमार्ग से जोड़ने की भी योजना है, जिससे श्रद्धालु नाव और क्रूज के माध्यम से यहां आसानी से पहुंच सकेंगे। राज्य सरकार आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयासरत है, जिससे न केवल धार्मिक स्थलों को वैश्विक पहचान मिलेगी बल्कि स्थानीय स्तर पर विकास को भी गति मिलेगी।
इस घाट को आधुनिक रिवर फ्रंट की तर्ज पर विकसित किया गया है, जो एक ओर नदी किनारे स्थित मंदिरों को कटाव से सुरक्षित रखेगा, वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी गई है। निर्माण में कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों का उपयोग किया गया है। घाट को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए गैबियन और रिटेनिंग वॉल तकनीक अपनाई गई है, जिससे यह देखने में प्राचीन घाटों जैसा प्रतीत होगा और बाढ़ के समय भी सुरक्षित रहेगा।
घाट पर तीन स्तरों वाले प्लेटफॉर्म, चौड़ी सीढ़ियां, शौचालय, पोर्टेबल चेंजिंग रूम, साइनेज, पार्किंग व्यवस्था, पत्थर की बेंच और आकर्षक रेलिंग जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं। यह परियोजना न केवल धार्मिक आस्था को मजबूती देगी बल्कि पर्यटन को भी नई दिशा प्रदान करेगी।
