• Banaras Now, Varanasi
  • October 11, 2026

वाराणसी। कभी तंग गलियों, लटकते बिजली के तारों के मकड़जाल, सीवर की बदहाली और जाम से जूझने वाली आध्यात्मिक राजधानी काशी ने बीते 11 वर्षों (2014 से अब तक) में विकास और विरासत के संतुलन की एक नई गाथा लिखी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में संसदीय प्रतिनिधित्व संभालने के बाद से वाराणसी को 50,000 करोड़ रुपये से अधिक लागत की 600 से ज्यादा छोटी-बड़ी विकास परियोजनाओं की सौगात मिल चुकी है। इन परियोजनाओं ने प्राचीन नगरी की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए इसके ढांचे को आधुनिक महानगर के रूप में पुनर्परिभाषित किया है।

सड़क व परिवहन: जाम के झाम से रिंग रोड और एलिवेटेड हाइवे का सफर

वर्ष 2014 से पहले वाराणसी शहर में प्रवेश करना किसी चुनौती से कम नहीं था। बाबतपुर हवाई अड्डे से कैंट स्टेशन तक की महज 22 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो से तीन घंटे का समय लगता था। भारी वाहन शहर के भीतर से गुजरते थे, जिससे गोदौलिया, लंका और कैंट चौराहे दिनभर भीषण जाम में फंसे रहते थे। शहर में न कोई व्यवस्थित रिंग रोड थी और न ही सुगम बाइपास।

बीते 11 वर्षों में बाबतपुर-वाराणसी फोर-लेन हाईवे के निर्माण से एयरपोर्ट की दूरी 25 से 30 मिनट में सिमट गई। वाराणसी रिंग रोड के विभिन्न चरणों ने भारी ट्रैफिक को शहर के बाहर ही मोड़ दिया। इसके अलावा लहरतारा-चौकाघाट फ्लाईओवर, भिखारीपुर फ्लाईओवर और मंडुवाडीह ओवरब्रिज जैसे बुनियादी ढांचों ने आंतरिक यातायात की रफ्तार बढ़ा दी। देश का पहला पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोप-वे प्रोजेक्ट कैंट रेलवे स्टेशन को गोदौलिया से सीधे जोड़कर संकरी गलियों के ऊपर सुगम यात्रा का विकल्प तैयार कर चुका है।

धार्मिक पर्यटन और घाट: संकरी गलियों से 5.5 एकड़ का भव्य कॉरिडोर

2014 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर महज 3,000 वर्ग फीट के एक छोटे और तंग परिसर में सिमटा था। सावन और शिवरात्रि जैसे त्योहारों पर श्रद्धालुओं को संकरी गलियों में घंटों धूप और बारिश में कतारबद्ध रहना पड़ता था। गंगा स्नान के बाद मंदिर तक पहुंचने के लिए तंग और गंदगी भरी गलियों से होकर गुजरना मजबूरी थी। गंगा के घाटों पर प्रकाश, स्वच्छता और बुनियादी जनसुविधाओं का भारी अभाव था।

दिसंबर 2021 में लोकार्पित 355 करोड़ रुपये का श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर 5.5 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत होकर गंगा को सीधे बाबा विश्वनाथ के दरबार से जोड़ चुका है। अब एक साथ 50,000 से अधिक श्रद्धालु सुगमता से दर्शन कर सकते हैं। वहीं खिड़किया घाट का कायाकल्प कर बना अत्याधुनिक ‘नमो घाट’ जल, थल और नभ (हेलीपैड) तीनों से जुड़ने वाला शहर का पहला मॉडल घाट बन गया। दशाश्वमेध और चेतसिंह घाट पर दैनिक आरती के साथ हाई-टेक लेजर लाइट एंड साउंड शो, सीएनजी संचालित नावें और एमवी गंगा विलास जैसे विश्वस्तरीय क्रूज ने पर्यटन को वैश्विक मंच पर पहुंचा दिया है। जहां 2014 से पहले सालाना औसतन 50 से 60 लाख पर्यटक आते थे, वहीं अब यह आंकड़ा सालाना 7 से 8 करोड़ के पार पहुंच रहा है।

स्वास्थ्य और शिक्षा: बीएचयू की सीमा से निकलकर पूर्वांचल का मेडिकल हब

2014 से पहले पूरे पूर्वांचल, पश्चिमी बिहार और नेपाल सीमा तक के मरीजों का एकमात्र सहारा बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल था, जहां बिस्तरों की कमी और लंबी प्रतीक्षा सूची आम बात थी। कैंसर के इलाज के लिए मरीजों को मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल का रुख करना पड़ता था, जिससे गरीब परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता था।

बीते एक दशक में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र और होमी भाभा कैंसर अस्पताल लहरतारा स्थापित किए गए। इन केंद्रों ने पूर्वांचल के लाखों कैंसर मरीजों को स्थानीय स्तर पर अत्याधुनिक इलाज मुहैया कराया है। इसके साथ ही बीएचयू में 430 बेड का सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक, कबीरचौरा मंडलीय अस्पताल का अपग्रेडेशन और ईएसआईसी (ESIC) अस्पताल की क्षमता वृद्धि ने काशी को उत्तर भारत का प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र बना दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालयों को स्मार्ट क्लास में बदला गया, रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर जैसी विश्वस्तरीय अकादमिक-सांस्कृतिक सुविधाएं बनीं और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स टेक्नोलॉजी (CIPET) जैसे संस्थान खुले।

शहरी बुनियादी ढांचा, स्वच्छता और पर्यावरण

2014 से पूर्व बनारस की पहचान आसमान में झूलते बिजली के अनियंत्रित तारों और खुले सीवरों से होती थी। गंगा एक्शन प्लान के बावजूद शहर का करोड़ों लीटर अशोधित सीवर सीधे गंगा में गिरता था। शहर के ऐतिहासिक मोहल्लों में लो-वोल्टेज और बार-बार बिजली गुल होना रोजमर्रा की समस्या थी।

इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) के तहत पुराने शहर के सैकड़ों किलोमीटर क्षेत्र से ओवरहेड तारों को हटाकर भूमिगत केबल नेटवर्क बिछाया गया। दीनापुर (140 MLD), गोइठा और भगवानपुर में अत्याधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित कर अस्सी और वरुणा नदियों के गंदे नालों को गंगा में गिरने से रोका गया। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) स्थापित हुआ, जिससे शहर के चप्पे-चप्पे पर यातायात प्रबंधन और सुरक्षा कैमरों की निगरानी संभव हुई।

रेलवे और विमानन कनेक्टिविटी

2014 में वाराणसी कैंट स्टेशन अत्यधिक भीड़भाड़ और सीमित यात्री सुविधाओं से जूझता था। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के नाम पर बाबतपुर एयरपोर्ट से सीमित सेवाएं थीं।

आज वाराणसी कैंट स्टेशन को एयरपोर्ट जैसी सुविधाओं (एस्केलेटर, वीआईपी लाउंज, आधुनिक वेटिंग हॉल) से लैस किया गया है, जबकि मंडुवाडीह को ‘बनारस’ स्टेशन के नाम से एक विश्वस्तरीय टर्मिनल के रूप में विकसित किया गया। वंदे भारत एक्सप्रेस की शुरुआत सबसे पहले दिल्ली-वाराणसी रूट से ही हुई। लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर नए रनवे विस्तार, NH-31 पर अंडरपास टनल निर्माण और टर्मिनल क्षमता विस्तार पर 2,800 करोड़ रुपये से अधिक की योजनाएं जमीन पर उतर चुकी हैं।

हस्तशिल्प और स्थानीय अर्थव्यवस्था को संजीवनी

2014 से पहले बिचौलियों, कच्चे माल की कमी और बिजली संकट के कारण बनारसी साड़ी और हस्तशिल्प उद्योग बंदी के कगार पर था। बुनकरों को न तो उनकी कला का उचित मूल्य मिलता था और न ही वैश्विक बाजार तक सीधी पहुंच।

बड़ा लालपुर में 300 करोड़ रुपये की लागत से बने ‘दीनदयाल हस्तकला संकुल’ (ट्रेड फैसिलिटेशन सेंटर) ने बुनकरों और शिल्पकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया। बनारसी साड़ी, गुलाबी मीनाकारी, लकड़ी के खिलौने, भदोही कालीन और मेटल क्राफ्ट सहित क्षेत्र के 20 से अधिक उत्पादों को जीआई (GI) टैग दिलाया गया। करखियांव में बना अमूल का बनास डेयरी प्लांट प्रतिदिन लाखों लीटर दूध प्रसंस्करण के साथ स्थानीय किसानों व पशुपालकों को सीधा आर्थिक लाभ दे रहा है।

कुल मिलाकर, 2014 से अब तक के 11 वर्षों में वाराणसी ने ठहराव के दौर से निकलकर सतत विकास का दौर देखा है। 580 से अधिक पूर्ण और निर्माणाधीन परियोजनाओं ने काशी के सांस्कृतिक व पौराणिक स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना इसे 21वीं सदी की आधुनिक जीवनशैली और तकनीक से जोड़ दिया है।

Author

thefrontfaceindia@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *