काशी के संतों ने अंग्रेजों के खिलाफ तैयार किया था गुप्त नेटवर्क, मठ, अखाड़े और आश्रमों ने दी क्रांतिकारियों को छुपने की जगह, सन्यासियों ने निकाली प्रभात फेरी
वाराणसी: भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में धर्म और आध्यात्म की वैश्विक राजधानी काशी का योगदान केवल राजनीतिक भाषणों और सत्याग्रहों तक सीमित नहीं था। काशी के संतों, संन्यासियों, मठ-मंदिरों …
वाराणसी: भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में धर्म और आध्यात्म की वैश्विक राजधानी काशी का योगदान केवल राजनीतिक भाषणों और सत्याग्रहों तक सीमित नहीं था। काशी के संतों, संन्यासियों, मठ-मंदिरों और पारंपरिक अखाड़ों ने आजादी की इस लड़ाई को एक मजबूत नैतिक, वैचारिक और व्यावहारिक धरातल प्रदान किया। यहाँ के संत समाज ने स्वाधीनता को केवल सत्ता हस्तांतरण या राजनीतिक मुक्ति नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और आत्म-सम्मान की रक्षा के रूप में देखा।
1857 की क्रांति और नागा संन्यासियों की गुप्त रणनीति
काशी की अखाड़ा परंपरा हमेशा से ‘शास्त्र और शस्त्र’ के संतुलन पर आधारित रही है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देशव्यापी असंतोष भड़का, तब काशी के अखाड़ों से जुड़े संन्यासियों और साधुओं ने ब्रिटिश निगरानी तंत्र को चकमा देने के लिए एक गुप्त संपर्क नेटवर्क तैयार किया।
साधु-संन्यासी भेष में ये क्रांतिकारी देश के एक कोने से दूसरे तीर्थ स्थल तक क्रांति के गुप्त संदेश और प्रतीक (जैसे कमल और रोटी) सुरक्षित रूप से पहुंचाते थे। अंग्रेजों के लिए तीर्थयात्रियों और साधुओं की सामान्य आवाजाही पर सीधे संदेह करना या उन पर पाबंदी लगाना बेहद कठिन था, जिसका लाभ स्वाधीनता सेनानियों को मिला।
मठों में शरण और क्रांतिकारियों को संरक्षण
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी पुलिस भूमिगत क्रांतिकारियों की तलाश में छापे मार रही थी, तब काशी के घाट, प्राचीन मठ और आश्रम उनके लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह साबित हुए।
चंद्रशेखर आजाद, शचींद्रनाथ सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त और बटुकेश्वर दत्त जैसे शीर्ष क्रांतिकारियों को काशी के कई संतों, मठाधीशों और पुजारियों ने अपने परिसरों में गुप्त रूप से आश्रय दिया। इतना ही नहीं, संतों द्वारा संचालित प्रसिद्ध अन्नक्षेत्रों और मठों के संसाधनों से इन क्रांतिकारियों के भोजन, चिकित्सा और गुप्त गतिविधियों के लिए आर्थिक सहायता का प्रबंध किया जाता रहा।
स्वामी दयानंद और स्वामी विवेकानंद की वैचारिक प्रेरणा
यद्यपि स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद ने प्रत्यक्ष चुनावी या दलगत राजनीति में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन काशी में उनके शास्त्रार्थ, व्याख्यान और प्रवास ने भारतीय मानस में आत्मगौरव और ‘स्वराज’ की भावना को गहराई से स्थापित किया। स्वामी विवेकानंद के काशी प्रवास और उनके ओजस्वी विचारों ने काशी के युवा छात्रों और साधु वर्ग में राष्ट्रीयता व निर्भयता की भावना भरी, जिसने आगे चलकर कई नौजवानों को स्वाधीनता संग्राम की ओर प्रेरित किया।
गांधीवादी आंदोलनों में संतों और प्रभात फेरियों का असर
महात्मा गांधी के काशी आगमन के दौरान संत और विद्वत समाज ने उनके विचारों को व्यापक समर्थन दिया। असहयोग आंदोलन (1920-22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) के दौर में काशी के प्रबुद्ध संतों ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को धर्म-सम्मत कर्तव्य घोषित किया।
1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय काशी के साधु-संतों की मंडलियों ने संकीर्तन, प्रभात फेरियों और धार्मिक प्रवचनों के माध्यम से गाँव-गाँव जाकर आम जनता को जागरूक किया। भजन और कीर्तन के जरिए राष्ट्रीय एकता और विदेशी हुकूमत के विरोध का संदेश सीधे जनमानस तक पहुँचाया गया।
संतों के योगदान का बहुआयामी स्वरूप
- वैचारिक चेतना: शास्त्रों और वैदिक दर्शन के माध्यम से स्वाधीनता को प्रत्येक नागरिक का प्राकृतिक और नैतिक अधिकार सिद्ध किया।
- रणनीतिक आश्रय: भूमिगत आंदोलनकारियों को सुरक्षित ठिकाना, रसद और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया।
- सामाजिक समरसता: अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक एकजुटता का आह्वान कर स्वतंत्रता आंदोलन को एक समेकित जन-आंदोलन का रूप दिया।
- जन-जागरण: धार्मिक मंचों और पारंपरिक आयोजनों का उपयोग ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करने में किया।

