• Banaras Now, Varanasi
  • May 30, 2026

वाराणसी: काशी की प्राचीन और प्रसिद्ध कला गुलाबी मीनाकारी एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काशी दौरे के दौरान विधायकों द्वारा उन्हें श्री काशी विश्वनाथ धाम की बेहद आकर्षक और बारीकी से तैयार की गई प्रतिकृति भेंट की गई। इस विशेष कलाकृति ने न सिर्फ प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित किया, बल्कि देशभर के व्यापारियों और कला प्रेमियों के बीच भी इसकी मांग अचानक बढ़ गई है।

यह प्रतिकृति करीब 200 ग्राम चांदी से तैयार की गई है, जिस पर गोल्ड पॉलिश कर इसे और अधिक आकर्षक बनाया गया है। इसमें मंदिर के दोनों शिखरों, त्रिशूल और नंदी की आकृति को बेहद सूक्ष्मता और कलात्मकता के साथ उकेरा गया है। पूरी प्रतिकृति देखने में बिल्कुल श्री काशी विश्वनाथ धाम का लघु स्वरूप प्रतीत होती है।

इस विशेष मॉडल को तैयार करने में पांच कारीगरों की टीम ने लगभग एक सप्ताह तक लगातार मेहनत की। इस प्रतिकृति की कीमत 75 हजार से 80 हजार रुपये के बीच बताई जा रही है। कारीगरों की मेहनत और बारीकी इस मॉडल में साफ झलकती है, जो इसे खास बनाती है।

ऑर्डर की लगी कतार, बढ़ी मांग

इस प्रतिकृति को तैयार करने वाले नेशनल अवॉर्डी मास्टर आर्टिजन कुंज बिहारी ने बताया कि जैसे ही यह कलाकृति प्रधानमंत्री को भेंट की गई, वैसे ही उनके पास देशभर से फोन आने शुरू हो गए। उन्होंने बताया कि मात्र 12 घंटे के भीतर ही करीब 20 पीस के ऑर्डर मिल चुके हैं। इन ऑर्डर्स में दिल्ली, मुंबई और अन्य बड़े शहरों के व्यापारी शामिल हैं, जो इस कला को अपने बाजार में उतारना चाहते हैं।

कुंज बिहारी ने यह भी बताया कि इससे पहले भी प्रधानमंत्री को राम मंदिर की मीनाकारी प्रतिकृति भेंट की गई थी, जिसके बाद दीपावली के अवसर पर करोड़ों रुपये का कारोबार हुआ था। ऐसे में इस बार भी कारीगरों को बड़े व्यापार की उम्मीद है।

टीमवर्क और कारीगरी का शानदार नमूना

कारीगर कुंज बिहारी के अनुसार, यह प्रतिकृति उन्हें प्रशासनिक अधिकारियों के निर्देश पर तैयार करनी थी। हालांकि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि यह किसे भेंट की जाएगी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर इसे पूरी निष्ठा और लगन से तैयार किया।

गुलाबी मीनाकारी में कई चरणों में काम किया जाता है। इसमें डिजाइन तैयार करना, चांदी का ढांचा बनाना, उस पर नक्काशी करना और फिर मीनाकारी का काम करना शामिल होता है। इस पूरी प्रक्रिया में हर कारीगर की अलग विशेषज्ञता होती है, जिसके चलते टीमवर्क बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

महिला कारीगरों की बड़ी भागीदारी

इस प्रतिकृति को तैयार करने में महिला कारीगरों की भी अहम भूमिका रही। चांदनी यादव, जो पिछले 10 वर्षों से इस कला से जुड़ी हैं, ने मीनाकारी का काम संभाला। उन्होंने बताया कि चांदी के ढांचे पर मीना चढ़ाना उन्हें बेहद पसंद है और इस मॉडल को तैयार करना उनके लिए गर्व की बात है।

वहीं, तनु यादव, जो पिछले पांच वर्षों से इस कला में कार्यरत हैं, ने डिजाइन और ढांचा तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री तक उनकी कला पहुंचना उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि है और इससे उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है।

गुलाबी मीनाकारी: काशी की विरासत

गुलाबी मीनाकारी की शुरुआत मुगल काल में 16वीं शताब्दी में हुई थी और यह धीरे-धीरे वाराणसी की पहचान बन गई। इस कला में चांदी के आधार पर रंगीन इनेमल से डिजाइन बनाई जाती है, जिससे उत्पादों में अनोखी चमक और सुंदरता आती है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियां, आभूषण और सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं।

मीनाकारी के तीन प्रमुख प्रकार होते हैं—एक रंग मीना, पंचरंगी मीना और गुलाबी मीनाकारी। इनमें से गुलाबी मीनाकारी बनारस की विशेष पहचान है, जिसमें गुलाबी रंग का विशेष प्रयोग किया जाता है।

GI टैग के बाद बदली तस्वीर

कारीगरों के अनुसार, एक समय ऐसा था जब यह कला खत्म होने की कगार पर पहुंच गई थी। बाजार में उचित मूल्य न मिलने और मांग कम होने के कारण कारीगर इस पेशे से दूर होने लगे थे। नई पीढ़ी भी इस कला में रुचि नहीं दिखा रही थी।

लेकिन वर्ष 2015 में गुलाबी मीनाकारी को GI टैग मिलने के बाद इसकी स्थिति में बड़ा बदलाव आया। सरकार की पहल, ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार के चलते अब यह कला देश-विदेश में अपनी पहचान बना चुकी है। आज इस कला से जुड़े कारीगर हर साल करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहे हैं और इस पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

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