वाराणसी। पूर्वांचल के वाराणसी और गाजीपुर जिले की सदियों पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को नया जीवन देने की दिशा में सरकार ने बड़ी पहल की है। लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रही इन धरोहरों को अब संरक्षित और विकसित किया जाएगा। पर्यटन एवं पुरातत्व विभाग ने इसके लिए विस्तृत मास्टर प्लान तैयार किया है, जिसके तहत जर्जर हो चुकी इमारतों और मंदिरों की मरम्मत, संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाएगा। साथ ही इन स्थलों को पर्यटन के लिहाज से भी विकसित किया जाएगा, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को बेहतर अनुभव मिल सके।
इस योजना में वाराणसी के राजातालाब क्षेत्र का अश्वारी शिव मंदिर, अर्दली बाजार स्थित ऐतिहासिक गोपाल लाल विला और गाजीपुर के पाली गांव का प्राचीन राधा कृष्ण मंदिर शामिल हैं। इन सभी स्थलों की पहचान उनके ऐतिहासिक महत्व, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है।
अश्वारी शिव मंदिर, राजातालाब (वाराणसी)
राजातालाब क्षेत्र के अश्वारी में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर पेशवा काल की धरोहर माना जाता है। मंदिर का इतिहास लगभग 290 वर्ष पुराना बताया जाता है और इसका निर्माण पेशवाओं के समय काशी के धार्मिक पुनरुद्धार के दौरान कराया गया था। उस समय पेशवाओं ने काशी को सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए शहर और आसपास के क्षेत्रों में कई मंदिरों का निर्माण कराया था।
इस मंदिर की वास्तुकला इसकी सबसे बड़ी खासियत है। ऊंचा शिखर, पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और गर्भगृह की संरचना उस दौर की उत्कृष्ट निर्माण शैली को दर्शाती है। हालांकि समय के साथ मंदिर की दीवारें कमजोर हो गई हैं और कई हिस्सों में जर्जरता साफ दिखाई देती है। अब इस योजना के तहत मंदिर की मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए इसकी मजबूती बढ़ाई जाएगी और यहां श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
गोपाल लाल विला, अर्दली बाजार (वाराणसी)
अर्दली बाजार स्थित एलटी कॉलेज परिसर में बना गोपाल लाल विला ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है, लेकिन वर्तमान में यह पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है। लगभग 50 वर्गमीटर क्षेत्र में फैली इस इमारत में कई छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं, जो कभी एक भव्य संरचना का हिस्सा रहे होंगे।
इस स्थल की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह है कि महान संत और विचारक स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में यहां करीब सवा महीने तक प्रवास किया था। वर्ष 1902 में जब वे अस्वस्थ हुए, तब उन्होंने यहीं रहकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया था। इस वजह से यह स्थान आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।
फिलहाल यह संपत्ति शिक्षा विभाग के अधीन है, लेकिन अब इसे संरक्षित कर एक महत्वपूर्ण हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है। यहां बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ इसे एक आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि लोग इस ऐतिहासिक विरासत को करीब से जान सकें।
राधा कृष्ण मंदिर, पाली (गाजीपुर)
गाजीपुर जिले के पाली गांव में स्थित राधा कृष्ण मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना बताया जाता है और यह अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर 56 खंभों पर खड़ा है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है। मंदिर का निर्माण राजस्थानी शैली में किया गया है, जिसमें पत्थरों की सुंदर नक्काशी और भव्य संरचना देखने को मिलती है।
मंदिर में स्थापित राधा-कृष्ण की अष्टधातु की मूर्ति इसकी प्रमुख पहचान है और यह श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इस मंदिर के नाम से बैंक में कुछ धनराशि जमा की गई थी, जिसका ब्याज आज भी प्राप्त होता है। यह तथ्य इस मंदिर की ऐतिहासिक महत्ता को और भी बढ़ा देता है।
हालांकि समय के साथ इस मंदिर की संरचना भी कमजोर हो गई है, लेकिन अब इसके संरक्षण और सौंदर्यीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। इससे न केवल मंदिर की भव्यता फिर से लौटेगी, बल्कि यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के केंद्र के रूप में भी विकसित होगा।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि इन सभी धरोहरों का विकास उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। उद्देश्य यह है कि इन स्थलों की मूल पहचान को बरकरार रखते हुए उन्हें आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाए।
सरकार की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि बनारस और गाजीपुर की ये अनमोल धरोहरें एक बार फिर अपनी खोई हुई पहचान वापस पाएंगी। साथ ही, यह कदम पूर्वांचल में पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।